Bharat अनादिकालीन युग
कालातीत–१४५०० BCE
पूर्वकालीन युग
१४५००–१०५०० BCE
पुरातन युग
१०५००–९००० BCE
सत युग
९०००–६७७७ BCE
त्रेता युग
६७७७–५५७७ BCE
द्वापर युग
५५७७–३१७६ BCE
कलि युग
३१७६–२०००+ BCE
ध्यान युग
२०००–१ BCE
सांकेतिक युग
१–१००० CE
भक्ति युग
१०००–१५०० CE
माध्यमिक युग
१५००–१९५० CE
आधुनिक युग
१९५० CE–वर्तमान
अस्वीकरण
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पृष्ठभूमि

इस वेबसाइट के माध्यम से हम भारत के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति तथा आध्यात्मिक ज्ञान के कुछ विशिष्ट पहलुओं को प्रस्तुत कर रहे हैं ।

हमारा विश्वास है कि प्राचीन काल में भारत के सर्वांगीण विकास की आधारशिला उसकी संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित थी ।

अपने अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय के अनुभव में हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि आध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है । जब व्यक्ति को अपनी संस्कृति पर गर्व होता है, तब उसके भीतर कुछ बड़ा करने की प्रेरणा जागृत होती है । साथ ही, स्वयं को गहराई से समझने पर अपने संगठन की शक्तियों और कमियों को पहचानना सरल हो जाता है । बाज़ारों के अवसर और खतरे भी सही समय पर अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं । किसी भी व्यवसाय की सफलता के लिए ये सभी बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं ।

आज भारत पुनः अपने गौरवशाली स्थान की ओर अग्रसर है । हमें विश्वास है कि देश की आर्थिक प्रगति का नेतृत्व करने वाले हमारे उद्यमी और नीति-निर्माता भारत के समृद्ध अतीत से प्रेरणा प्राप्त करेंगे ।

सारांश

ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर हमने समय को तीन प्रमुख कालखंडों में विभाजित किया है ।

आदिकालीन युग

हमारी सभ्यता में बाह्य जगत और आंतरिक जगत का अध्ययन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ था । वास्तव में दोनों को एक ही सत्य की अभिव्यक्ति माना गया, जिसे यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे के सूत्र में व्यक्त किया गया है । अनादिकालीन युग में हमने वैदिक ज्ञान में वर्णित विज्ञान के कुछ मूलभूत प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत किए हैं—जैसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई, उसका विकास कैसे हुआ, उसका विस्तार कितना है तथा भविष्य में उसका विकास किस प्रकार होगा ।

ऐसा माना जाता है कि विज्ञान भैरव मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन ज्ञान-स्रोतों में से एक है । इसमें भगवान शंकर (आदि योगी) द्वारा माता पार्वती को प्रदान की गई ११२ ध्यान विधियों का वर्णन है । इसी ज्ञान से पूर्वकालीन युग का प्रारंभ माना जाता है । भगवान शंकर ने समाज की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था तथा उसके संचालन के सिद्धांतों को परिभाषित किया । उन्होंने यह ज्ञान अपने सात शिष्यों—सप्तऋषियों को प्रदान किया, जहाँ से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से यह ज्ञान विश्व के विभिन्न भागों में प्रसारित हुआ ।

पुरातन युग के दौरान वैदिक ज्ञान अनेक विषयों और विधाओं में विकसित हुआ । इस युग के अंत तक विद्वानों ने अनुभव किया कि विभिन्न ज्ञानधाराओं का मूल एक ही है । इसलिए उन्होंने इसे आध्यात्मिक ज्ञान का चरम स्वरूप अर्थात् वेदांत कहा ।

मध्यकालीन युग

मध्यकालीन युग को पाँच भागों में विभाजित किया गया है—सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग, कलि युग तथा ध्यान युग । इन युगों में वैदिक ज्ञान का व्यापक अध्ययन हुआ, उसका अभ्यास किया गया तथा समय के साथ उसका निरंतर विस्तार भी हुआ । कलियुग के आरंभ तक,

ध्यान युग के मध्य में ऋषियों ने इस विस्तृत ज्ञान को व्यवस्थित रूप से संकलित करना प्रारंभ किया । महर्षि वेदव्यास ने इसे चार वेदों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—के रूप में संगठित किया । महर्षि पतंजलि ने योग की विविध साधनाओं को अष्टांग योग के रूप में व्यवस्थित किया । उस समय समाज भौतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध था और जीवन की अधिकांश सुविधाएँ उपलब्ध थीं, किन्तु मानसिक शांति का अभाव था । ऐसे समय में बुद्ध, महावीर तथा अनेक अन्य प्रबुद्ध आचार्यों ने वैदिक ज्ञान को नए दृष्टिकोण से पुनर्जीवित किया और समाज को शांति एवं आत्मबोध का मार्ग दिखाया ।

नवकालीन युग

आध्यात्मिक ज्ञान का प्रत्यक्ष अनुभव और उसे धारण करना सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है । इसलिए प्रत्येक ४००–५०० वर्षों में किसी महान गुरु द्वारा उसके पुनर्जीवन के पश्चात भी समय के साथ उसका मूल स्वरूप धीरे-धीरे लुप्त होने लगता था । सांकेतिक युग के दौरान विद्वानों ने इस ज्ञान को कथाओं, प्रतीकों और रूपकों के माध्यम से प्रस्तुत करना प्रारंभ किया, जिससे इसे अधिक लोगों तक पहुँचाया जा सके और इसकी परंपरा लंबे समय तक सुरक्षित रह सके ।

जैसे-जैसे यह ज्ञान समाज में व्यापक होता गया, वैसे-वैसे भक्ति युग में अनेक संतों और भक्ति मार्ग के आचार्यों का उदय हुआ । उन्होंने भक्ति को आत्मिक उन्नति का सहज माध्यम बनाकर जन-जन तक पहुँचाया तथा लोगों के हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव जागृत किया ।

भारत की समृद्ध ज्ञान-परंपरा और आर्थिक सम्पन्नता ने मध्य-पूर्व तथा पश्चिम के अनेक आक्रमणकारियों को आकर्षित किया । माध्यमिक युग में मुख्यतः इन विदेशी आक्रमणों तथा उनके हमारी शिक्षा व्यवस्था, समाज, संस्कृति और व्यापार पर पड़े प्रभावों का वर्णन किया गया है ।

अंततः, स्वराज की प्राप्ति के पश्चात आधुनिक युग में भारत द्वारा अपनी शिक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक नेतृत्व की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है ।