जैन तीर्थंकर
जैन परम्परा भारत की प्राचीनतम आध्यात्मिक परम्पराओं में से एक है । इसके अनुसार समय-समय पर चौबीस तीर्थंकर मानव समाज को धर्म, आत्मसंयम और मोक्ष का मार्ग दिखाने के लिए प्रकट हुए । प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव माने जाते हैं, जबकि भगवान महावीर चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे । प्रत्येक तीर्थंकर ने आत्मशुद्धि, अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह तथा तप पर आधारित जीवन का उपदेश दिया और ध्यान को आत्मानुभूति का प्रमुख साधन माना ।
वेदवीर आर्य की कालगणना[1] के अनुसार भगवान महावीर का जीवनकाल लगभग १९२३–१८५१ BCE माना जाता है । राजपरिवार में जन्म लेने के पश्चात उन्होंने लगभग तीस वर्ष की आयु में गृहत्याग किया और बारह वर्षों तक कठोर तप, ध्यान तथा आत्मसंयम का अभ्यास किया । इसके उपरांत उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन आत्मज्ञान तथा मोक्ष का मार्ग जनसामान्य को सिखाने में समर्पित किया ।
जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख और अनन्त शक्ति का स्वभाव विद्यमान है, किन्तु कर्मों के बन्धन के कारण उसका वास्तविक स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता । ध्यान, तप, संयम और सम्यक् आचरण के माध्यम से इन कर्मबन्धनों का क्षय किया जा सकता है । जब समस्त कर्म समाप्त हो जाते हैं, तब जीव अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव करता है, जिसे कैवल्य या मोक्ष कहा गया है ।
जैन साधना में ध्यान का अत्यंत महत्त्व है । समता, आत्मनिरीक्षण, क्षमा, वैराग्य और अहिंसा के अभ्यास द्वारा साधक मन को निर्मल बनाता है और कर्मों के बन्धन से मुक्त होने का प्रयास करता है । जैन आचार्यों द्वारा विकसित ध्यान और तप की परम्परा ने भारतीय आध्यात्मिक चिंतन तथा योग साधना को गहराई से प्रभावित किया है ।
महात्मा बुद्ध
वेदवीर आर्य की कालगणना के अनुसार[1] महात्मा बुद्ध का जीवनकाल लगभग १८८७–१८०७ BCE माना जाता है । उनका जन्म कपिलवस्तु के शाक्य कुल में राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में हुआ । राजमहल में वैभवपूर्ण जीवन व्यतीत करने के बाद उन्होंने वृद्धावस्था, रोग, मृत्यु और एक संन्यासी को देखकर जीवन के वास्तविक उद्देश्य की खोज का संकल्प लिया । लगभग उनतीस वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग किया और अनेक वर्षों तक विभिन्न आचार्यों से अध्ययन तथा कठोर तपस्या की ।
दीर्घ साधना के पश्चात बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे उन्हें आत्मबोध प्राप्त हुआ और वे बुद्ध, अर्थात् जागृत पुरुष, कहलाए । इसके बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव समाज को दुःख से मुक्ति का मार्ग सिखाने में समर्पित कर दिया । उन्होंने किसी विशेष वर्ग, जाति या समुदाय तक अपने उपदेशों को सीमित नहीं रखा, बल्कि सभी के लिए करुणा, मैत्री और सदाचार का संदेश दिया ।
बुद्ध की शिक्षाओं का आधार चार आर्य सत्य और आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग हैं । उन्होंने बताया कि संसार में दुःख है, दुःख का कारण तृष्णा है, तृष्णा का निरोध संभव है, और उसके लिए सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति तथा सम्यक समाधि का अभ्यास आवश्यक है ।
ध्यान बुद्ध की साधना का केंद्रीय अंग था । उन्होंने विशेष रूप से आनापानसति (श्वास पर सजगता) और विपश्यना (वस्तुओं को उनके वास्तविक स्वरूप में देखना) पर बल दिया । उनके अनुसार ध्यान का उद्देश्य केवल मानसिक शांति प्राप्त करना नहीं, बल्कि मन की प्रकृति, इच्छाओं और दुःख के कारणों का प्रत्यक्ष अनुभव करना है । इसी प्रत्यक्ष ज्ञान से मनुष्य मोह, तृष्णा और अहंकार से मुक्त होकर निर्वाण की ओर अग्रसर होता है ।
महात्मा बुद्ध की करुणा, अहिंसा और आत्मनिरीक्षण पर आधारित शिक्षाओं ने भारत सहित सम्पूर्ण एशिया की आध्यात्मिक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया । आज भी उनकी ध्यान पद्धतियाँ विश्वभर में लाखों साधकों द्वारा आत्मविकास, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपनाई जाती हैं ।
महर्षि पतञ्जलि
वेदवीर आर्य की कालगणना[1] के अनुसार महर्षि पतञ्जलि का समय लगभग ७५० BCE माना जाता है । भारतीय दर्शन के इतिहास में उनका स्थान अत्यंत विशिष्ट है । उन्होंने योग की प्राचीन परंपरा को व्यवस्थित रूप प्रदान करते हुए योगसूत्र की रचना की, जो आज भी योग दर्शन का सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है । संक्षिप्त किन्तु अत्यंत गूढ़ सूत्रों में उन्होंने मनुष्य के मन, चित्त, संस्कार, कर्म तथा आत्मसाक्षात्कार के मार्ग का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया ।
महर्षि पतञ्जलि के अनुसार योग का वास्तविक उद्देश्य केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करना नहीं, बल्कि योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध है । जब मन की चंचलता शांत हो जाती है, तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है । इसी अवस्था को उन्होंने कैवल्य या पूर्ण स्वतंत्रता कहा है ।
योगसूत्र में उन्होंने साधना के लिए अष्टाङ्ग योग का मार्ग बताया—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । इन आठ अंगों में प्रत्येक अगले अंग की तैयारी करता है । आसन और प्राणायाम शरीर तथा प्राण को संतुलित करते हैं, प्रत्याहार इन्द्रियों को भीतर की ओर मोड़ता है, धारणा मन को एकाग्र करती है, ध्यान उस एकाग्रता को निरंतर बनाए रखता है, और अंततः समाधि आत्मानुभूति का द्वार खोलती है ।
महर्षि पतञ्जलि ने यह भी स्पष्ट किया कि साधना में प्रगति के लिए निरंतर अभ्यास (अभ्यास) और वैराग्य (वैराग्य) दोनों आवश्यक हैं । उन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह जैसे सार्वभौमिक जीवन मूल्यों को योग की आधारशिला माना । उनके योग दर्शन ने भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को गहराई से प्रभावित किया है और आज सम्पूर्ण विश्व में योग के अध्ययन एवं अभ्यास का प्रमुख आधार है ।
सम्राट अशोक
सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के सबसे प्रभावशाली शासकों में से एक थे । उनके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य अपने चरम पर पहुँचा और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में वर्तमान कर्नाटक तक, पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान और बलूचिस्तान से लेकर पूर्व में बंगाल तक फैला हुआ था । उनका साम्राज्य आधुनिक भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश तथा ईरान के कुछ भागों तक विस्तृत था, जो उस समय विश्व के सबसे बड़े और सुव्यवस्थित साम्राज्यों में से एक था ।
कलिंग युद्ध के भीषण विनाश ने सम्राट अशोक के जीवन की दिशा बदल दी । युद्ध में असंख्य लोगों की मृत्यु और पीड़ा को देखकर उन्होंने हिंसात्मक विजय का मार्ग त्याग दिया और धर्म, करुणा तथा अहिंसा पर आधारित शासन को अपनाया । इसके बाद उन्होंने अपने विशाल साम्राज्य में नैतिक जीवन, धार्मिक सहिष्णुता, जनकल्याण और प्राणिमात्र के प्रति दया को राज्य नीति का आधार बनाया ।
सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को व्यापक जनसमुदाय तक पहुँचाने में अभूतपूर्व योगदान दिया । उन्होंने स्तूपों, विहारों और शिक्षाकेंद्रों का निर्माण कराया तथा अपने शिलालेखों और स्तम्भों के माध्यम से धर्म, सदाचार, सत्य, अहिंसा और करुणा का संदेश सम्पूर्ण साम्राज्य में प्रसारित किया । उनके संरक्षण में बौद्ध भिक्षुओं को श्रीलंका, नेपाल, कश्मीर, गांधार, मध्य एशिया, सीरिया, मिस्र तथा यूनानी राज्यों सहित अनेक क्षेत्रों में धर्मप्रचार के लिए भेजा गया । उनके पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा द्वारा श्रीलंका में स्थापित बौद्ध परम्परा आज भी जीवित है ।
सम्राट अशोक के प्रयासों से बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं से निकलकर सम्पूर्ण एशिया में फैल गया । आने वाली शताब्दियों में यह श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, वियतनाम, चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान तक पहुँचा । आज भी करोड़ों लोग बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण करते हैं तथा ध्यान, करुणा और अहिंसा पर आधारित उनकी शिक्षाएँ विश्वभर में मानव कल्याण और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई हैं ।
संदर्भ
- The Chronology of India, Vedveer Arya. Mahabharata to Medieval Era 1. https://dokumen.pub/the-chronology-of-india-from-mahabharata-to-medieval-era-1
- The Chronology of India, Vedveer Arya. Mahabharata to Medieval Era 2. https://dokumen.pub/the-chronology-of-india-from-mahabharata-to-medieval-era-2