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यम

यम अष्टाङ्ग योग का प्रथम अंग है । यह हमारे बाहरी व्यवहार (आचार) को शुद्ध करने की संहिता है । प्रत्येक कर्म किसी विचार, उद्देश्य और भावना से प्रारम्भ होकर उसके परिणाम तक पहुँचता है । यम हमें सिखाता है कि हमारे प्रत्येक कर्म का आधार ऐसा हो जो हमारे, समाज और सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याण का कारण बने ।

यम के पाँच सिद्धान्त केवल नैतिक नियम नहीं हैं, बल्कि कर्म के पाँच चरण हैं । यदि इनका पालन किया जाए, तो प्रत्येक कर्म योग बन जाता है और जीवन में समरसता, शान्ति तथा प्रगति का आधार बनता है ।

अहिंसा – कल्याण की भावना

प्रत्येक कर्म का प्रथम आधार उसकी भावना (Intention) है । अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक कष्ट न पहुँचाना नहीं है । इसका वास्तविक अर्थ है कि हमारे मन में किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या अथवा हानि की भावना न हो । प्रत्येक कर्म के पीछे दूसरों के कल्याण और समष्टि के हित की भावना हो । ऐसी भावना से उत्पन्न कर्म ही वास्तव में अहिंसक होता है ।

सत्य – समय की कसौटी पर खरा उद्देश्य

सत्य वह है जो समय से परे अथवा समय की कसौटी पर स्थिर रहे । कर्म का उद्देश्य ऐसा होना चाहिए जो क्षणिक लाभ के स्थान पर दीर्घकालीन कल्याण पर आधारित हो । जो उद्देश्य समय के साथ अपना मूल्य खो देता है, वह सत्य नहीं हो सकता ।

अस्तेय – निःस्वार्थता

अस्तेय का सामान्य अर्थ है चोरी न करना । इसका व्यापक अर्थ है कि कर्म का उद्देश्य केवल अपने लिए संग्रह करना न हो । जब हम केवल लेने की प्रवृत्ति छोड़कर योगदान और सेवा की भावना से कार्य करते हैं, तब हमारा कर्म निःस्वार्थ बन जाता है । यही कर्मयोग का आधार है ।

ब्रह्मचर्य – प्रकृति के अनुरूप कर्म

ब्रह्मचर्य का सामान्य अर्थ केवल संयम नहीं है । इसका गहरा अर्थ है ब्रह्म के अनुसार आचरण करना । अर्थात् सृष्टि के नियमों को समझकर उनके अनुरूप जीवन जीना । जब हमारे कर्म प्रकृति और धर्म के अनुरूप होते हैं, तब वे सहज, संतुलित और प्रभावशाली बनते हैं ।

अपरिग्रह – अनासक्ति

सत्कर्म से ज्ञान, सम्मान, शक्ति, धन और अनेक प्रकार की उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं । अपरिग्रह हमें सिखाता है कि इन उपलब्धियों के प्रति आसक्त न हों । प्राप्त साधनों को अपने अधिकार के रूप में न पकड़ें, बल्कि उन्हें समाज और सृष्टि की धरोहर समझें । त्याग की भावना से ही कर्म शुद्ध रहता है और व्यक्ति निरन्तर आगे बढ़ता है ।

नियम

नियम अष्टाङ्ग योग का दूसरा अंग है । यदि यम हमारे बाहरी आचरण को शुद्ध करता है, तो नियम हमारे आन्तरिक जीवन को शुद्ध करता है । यह हमें शरीर से लेकर आत्मा तक अपनी प्रत्येक परत को परिष्कृत करने का मार्ग दिखाता है । नियम के पाँच सिद्धान्त हमें बाहरी अनुशासन से आन्तरिक आनन्द की ओर ले जाते हैं ।

शौच – शरीर की शुद्धि

आन्तरिक यात्रा का प्रारम्भ शरीर से होता है । शौच का सामान्य अर्थ स्वच्छता है, परन्तु इसका उद्देश्य केवल शरीर को स्वच्छ रखना नहीं है । स्वच्छ शरीर स्वास्थ्य, स्फूर्ति तथा संतुलित जीवन का आधार बनता है । बाहरी स्वच्छता धीरे-धीरे मन और जीवन की स्वच्छता का भी कारण बनती है ।

सन्तोष – मन की शुद्धि

शरीर के बाद अगला स्तर मन का है । मन निरन्तर इच्छाओं और द्वेषों के बीच भटकता रहता है । सन्तोष का अर्थ उपलब्ध परिस्थितियों में निष्क्रिय हो जाना नहीं है, बल्कि तृष्णा और द्वेष से मुक्त होकर वर्तमान को स्वीकार करना है । ऐसा मन अधिक स्थिर, प्रसन्न और रचनात्मक बनता है ।

तप – बुद्धि का परिष्कार

तप का अर्थ केवल कठिन तपस्या नहीं है । इसका वास्तविक उद्देश्य बुद्धि को परिष्कृत करना है । अनुशासन, निरन्तर अभ्यास और कठिनाइयों का प्रसन्नतापूर्वक सामना करने से विवेक विकसित होता है और बुद्धि सत्य को पहचानने में समर्थ बनती है ।

स्वाध्याय – स्वयं का अध्ययन

स्वाध्याय दो शब्दों से मिलकर बना है – स्व अर्थात् स्वयं और अध्याय अर्थात् अध्ययन । इसका अर्थ केवल शास्त्रों का अध्ययन नहीं है, बल्कि अपने विचारों, भावनाओं, प्रवृत्तियों, पहचान और जीवन के उद्देश्य को समझना है । जब हम स्वयं को जानने लगते हैं, तब जीवन की दिशा स्वतः स्पष्ट होने लगती है ।

ईश्वर प्रणिधान – आत्मसमर्पण

इस यात्रा का अन्तिम चरण ईश्वर प्रणिधान है । आत्म-अध्ययन करते-करते साधक अन्ततः उस ब्रह्मतत्त्व तक पहुँचता है जो उसकी अपनी आत्मा का वास्तविक स्वरूप है । वही शुद्ध चैतन्य, शान्ति और आनन्द का स्रोत है । ईश्वर प्रणिधान का अर्थ किसी बाहरी सत्ता के प्रति भय नहीं, बल्कि उस परम सत्य के प्रति श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण है । यही समर्पण अहंकार का अंत और आनन्द का प्रारम्भ है ।

आसन

यम और नियम अष्टाङ्ग योग के सैद्धान्तिक आधार हैं । इसके बाद आने वाले दो अंग – आसन और प्राणायाम – शरीर एवं प्राण से सम्बन्धित हैं । आज सामान्यतः योग का अर्थ केवल आसनों तक सीमित समझ लिया जाता है, जबकि महर्षि पतञ्जलि के १९५ योगसूत्रों में आसन पर केवल ३ तथा प्राणायाम पर केवल ३ सूत्र हैं । अर्थात् सम्पूर्ण ग्रन्थ के केवल ६ सूत्र शरीर एवं श्वास से सम्बन्धित हैं । इससे स्पष्ट है कि योग का उद्देश्य केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि अन्ततः मन और चेतना का परिष्कार है ।

आसन का उद्देश्य शरीर को लचीला बनाना मात्र नहीं है । इसका वास्तविक उद्देश्य शरीर को स्थिर, सहज और संतुलित बनाना है, ताकि साधक बिना किसी शारीरिक बाधा के लम्बे समय तक ध्यान में स्थित रह सके । पतञ्जलि ने इसे स्थिरसुखम् आसनम् कहा है – अर्थात् ऐसा आसन जो स्थिर भी हो और सहज भी ।

प्राणायाम

आसन के बाद साधक प्राण के स्तर पर कार्य करता है । प्राणायाम का अर्थ केवल श्वास का अभ्यास नहीं, बल्कि शरीर में प्रवाहित होने वाली प्राणशक्ति को उचित दिशा देना है । महर्षि पतञ्जलि ने इस विषय पर भी केवल कुछ सूत्र दिए हैं, जिससे स्पष्ट है कि इसका महत्व उसकी गहराई में है, न कि उसकी जटिलता में ।

आध्यात्मिक यात्रा में यदि मन को आकाश में उड़ती पतंग माना जाए, तो प्राणायाम वह डोर है जिसके माध्यम से हम उसे दिशा देते हैं । प्राण के संतुलित होते ही मन के विचार और भावनाएँ भी सहज रूप से स्थिर होने लगती हैं ।

प्रत्याहार

अष्टाङ्ग योग के अन्तिम चार अंग साधक को आध्यात्मिक क्षेत्र में ले जाते हैं । प्रत्याहार शब्द प्रति और आहार से मिलकर बना है । यहाँ आहार का अर्थ केवल भोजन नहीं, बल्कि वह सब कुछ है जिसे हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से निरन्तर ग्रहण करते रहते हैं ।

प्रत्याहार की साधनाएँ हमें बाहरी संसार से भीतर की ओर ले जाती हैं । यह यात्रा इन्द्रियों से प्रारम्भ होकर स्थूल संवेदनाओं, सूक्ष्म संवेदनाओं तथा अन्ततः विचारों और भावनाओं तक पहुँचती है । साधक अपने भीतर घट रही सम्पूर्ण प्रक्रिया का साक्षी बनने लगता है ।

धारणा

जब प्राणायाम से मन स्थिर होने लगे और प्रत्याहार के माध्यम से साधक अपने अन्तर्मन का निरीक्षण करने लगे, तब अगला चरण धारणा है । धारणा ऐसी साधनाओं का समूह है जो मन को एकाग्र और एकबिन्दु बनाती हैं ।

सामान्य अवस्था में मन अनेक दिशाओं में भटकता रहता है । धारणा के अभ्यास से उसकी बिखरी हुई ऊर्जा एक केन्द्र पर एकत्रित होने लगती है । यही एकाग्रता आगे ध्यान का आधार बनती है ।

ध्यान

धारणा में मन को एक बिन्दु पर स्थिर किया जाता है । ध्यान में उस प्रयास को भी छोड़ दिया जाता है । साधक केवल साक्षी बनकर वास्तविकता को जैसी है वैसी ही देखना प्रारम्भ करता है । विचारों, धारणाओं और पूर्वाग्रहों के बिना जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव ही ध्यान है ।

ध्यान में मन को दबाया नहीं जाता, न ही विचारों से संघर्ष किया जाता है । केवल सजगता बनी रहती है और उसी सजगता में मन स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है ।

समाधि

समाधि अष्टाङ्ग योग का अंतिम अंग है । यहाँ साधक अपनी सभी धारणाओं, अवधारणाओं और मानसिक सीमाओं का अतिक्रमण करता है । समाधि का एक अर्थ है – समता में स्थित बुद्धि ।

जब ज्ञान का भी अतिक्रमण हो जाता है, तब प्रज्ञा का उदय होता है । वहाँ अनुभव किसी विचार, शब्द या सिद्धान्त पर आधारित नहीं रहता, बल्कि सत्य का प्रत्यक्ष बोध होता है । यही योग की चरम अवस्था है ।