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शिव तत्त्व

ऋग्वेद के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व केवल शिव तत्त्व विद्यमान था । वह नित्य, सर्वव्यापी और चेतन सत्ता थी, किन्तु उस समय उसमें कोई गतिविधि या अभिव्यक्ति नहीं थी । न समय था, न स्थान, न पदार्थ और न ही ऊर्जा । सम्पूर्ण अस्तित्व अव्यक्त अवस्था में शिव तत्त्व में ही निहित था ।

लगभग १५.७४९ नील (१०१३) वर्ष पूर्व शिव तत्त्व में प्रथम स्पंदन या कंपन उत्पन्न हुआ । भारतीय परम्परा में इसी घटना को प्रतीकात्मक रूप से शक्ति का शिव पर नृत्य कहा गया है । यही प्रथम स्पंदन सृष्टि के प्रकट होने का प्रारम्भ था ।

इन प्रथम स्पंदनों से एक नया आयाम प्रकट हुआ, जिसे चिदाकाश कहा जाता है । यह हमारे चार-आयामी ब्रह्माण्ड (समय और त्रि-आयामी अंतरिक्ष) से भिन्न चेतना का एक सूक्ष्म आयाम है । वैदिक व्याख्या के अनुसार इसी आयाम में प्रथम देवों का प्राकट्य हुआ । इनमें महादेव और नारायण प्रथम प्रमुख देव माने जाते हैं । यहाँ देव शब्द का अर्थ मानवाकार देवता नहीं, बल्कि सृष्टि के मूलभूत तत्त्वों अथवा आधारभूत शक्तियों से है, जिनसे आगे चलकर सम्पूर्ण सृष्टि का विकास हुआ ।

चिदाकाश से आगे अनेक सूक्ष्म आयामों की रचना हुई, जिन्हें चित्ताकाश कहा गया । प्रत्येक चित्ताकाश एक स्वतंत्र ब्रह्माण्ड का आधार बना तथा उसके अपने देव या मूलभूत तत्त्व थे । आगे चलकर इन्हीं तत्त्वों के परस्पर संयोग से भूताकाश की उत्पत्ति हुई, जहाँ समय, स्थान, पदार्थ और ऊर्जा का प्रकट रूप अस्तित्व में आया । हमारा ब्रह्माण्ड ऐसे ही अनेक भूताकाशों में से एक है ।

समय के साथ मानव चेतना भी विकसित हुई । लगभग १४,००० BCE में जन्मे प्रथम योगी शंकर ने गहन ध्यान के माध्यम से उस परम चेतना का प्रत्यक्ष अनुभव किया और जाना कि उनका वास्तविक स्वरूप शिव तत्त्व से भिन्न नहीं है । इसी अनुभूति के कारण उन्हें शिव के नाम से भी संबोधित किया जाने लगा ।

यद्यपि सामान्य बोलचाल में शिव, महादेव और शंकर शब्दों का प्रयोग एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, वैदिक दृष्टि से इनके अर्थ भिन्न हैं । शिव सम्पूर्ण अस्तित्व का शाश्वत आधार और परम तत्त्व हैं । महादेव सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट होने वाले प्रथम देवों में से एक हैं, जबकि शंकर वह प्रथम योगी हैं जिन्होंने शिव तत्त्व का प्रत्यक्ष अनुभव किया और मानव समाज को योग तथा आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया । इसी प्रकार नारायण सृष्टि के प्रारम्भ में प्रकट होने वाले प्रथम देवों में से एक हैं, जिनकी भूमिका सृष्टि के संरक्षण और विकास से संबंधित मानी गई है ।

क्षीर सागर

भारतीय परम्परा में नारायण को क्षीर सागर में शयन करते हुए दर्शाया जाता है । इसका अर्थ किसी भौतिक दूध के समुद्र से नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के प्रारम्भिक चरण का एक प्रतीक है । वैदिक व्याख्या के अनुसार प्रथम स्पंदनों से प्रकट हुए चिदाकाश में महादेव और नारायण जैसे प्रथम देवों का प्राकट्य हुआ । क्षीर सागर उसी चेतनामय आयाम का प्रतीक है, जहाँ से आगे चलकर अनेक चित्ताकाश और उनसे अनेक भूताकाशों (ब्रह्माण्डों) की रचना हुई ।

नारायण का शयन सृष्टि के प्रकट होने से पूर्व की संतुलित और संभावनाओं से परिपूर्ण अवस्था का प्रतीक है । जैसे-जैसे सृष्टि का विस्तार होता है, वही चेतना विभिन्न आयामों, देवों तथा ब्रह्माण्डों के रूप में अभिव्यक्त होती जाती है ।

सृष्टि का सृजन

वैदिक परम्परा में को सृष्टि का प्रथम नाद माना गया है । यह केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि नारायण से उत्पन्न वह आद्य स्पंदन है जिसने हमारे चित्ताकाश में सृष्टि के विकास का प्रारम्भ किया । इसी प्रथम कंपन से हमारे ब्रह्माण्ड के मूलभूत देवों अथवा तत्त्वों का प्राकट्य हुआ और आगे चलकर समय, स्थान, पदार्थ तथा ऊर्जा का विकास हुआ । इस प्रकार ॐ सम्पूर्ण सृष्टि के आधारभूत स्पंदन का प्रतीक है ।

पद्मनाभ और ब्रह्मा

भारतीय चित्रकला में भगवान नारायण की नाभि से एक कमल उत्पन्न होता हुआ तथा उस कमल पर ब्रह्मा विराजमान दिखाई देते हैं । यह चित्र सृष्टि के एक गहन आध्यात्मिक सिद्धांत का प्रतीक है । नारायण से उत्पन्न आद्य स्पंदन (ॐ) से हमारे चित्ताकाश में प्रथम देवों का विकास हुआ, जिनमें ब्रह्मा हमारे ब्रह्माण्ड के सृजन के अधिष्ठाता माने गए हैं ।

पद्मनाभ का शाब्दिक अर्थ है—कमल के समान नाभि वाला । कमल भारतीय दर्शन में पवित्रता, संतुलन और वैराग्य का प्रतीक है । वह कीचड़ में उत्पन्न होकर भी उससे अप्रभावित रहता है । उसी प्रकार सृष्टि का उद्भव प्रकृति की विविधता और परिवर्तन के मध्य होता है, किन्तु उसका मूल आधार शुद्ध चेतना ही रहती है ।

आदिशेष और अनन्तशेष

भारतीय परम्परा में नारायण को आदिशेष अथवा अनन्तशेष पर शयन करते हुए दर्शाया जाता है । यह भी एक गहन प्रतीक है । आदिशेष सृष्टि के प्रारम्भ से विद्यमान उस मूल आधार का प्रतीक है जिस पर सम्पूर्ण सृष्टि का विकास होता है । अनन्तशेष उसकी अनंतता का द्योतक है—जिसका न आदि है और न अंत ।

सर्प का रूप ऊर्जा, चेतना और चक्राकार गति का प्रतीक माना गया है । उसकी कुण्डलियाँ सृष्टि के सतत विस्तार और संकुचन, जन्म और विलय तथा अनन्त कालचक्र का संकेत देती हैं । इसी आधार पर नारायण का अनन्तशेष पर शयन यह दर्शाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि अनन्त चेतना के आधार पर स्थित है और उसी में उत्पन्न होकर अंततः उसी में विलीन हो जाती है ।

हिरण्यगर्भः

ऋग्वेद में हिरण्यगर्भः को सृष्टि के प्रथम प्रकट रूप के रूप में वर्णित किया गया है । शिव तत्त्व में उत्पन्न प्रथम स्पंदनों से चिदाकाश और फिर अनेक चित्ताकाशों का प्राकट्य हुआ । जब हमारे चित्ताकाश के मूलभूत देवों ने समय, स्थान, पदार्थ और ऊर्जा के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करना प्रारम्भ किया, तब सृष्टि एक अत्यन्त सघन, प्रकाशमान और ऊर्जा से परिपूर्ण अवस्था में प्रकट हुई । वैदिक साहित्य इसी अवस्था को हिरण्यगर्भः अथवा स्वर्णिम गर्भ कहता है । आधुनिक विज्ञान जिस घटना को Big Bang के रूप में वर्णित करता है, उसकी तुलना इस वैदिक अवधारणा से की जा सकती है ।

मनुस्मृति में इसी हिरण्यगर्भ को हजारों सूर्य के समान तेजस्वी स्वर्णिम अण्ड कहा गया है, जिससे ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ । यहाँ ब्रह्मा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के नहीं, बल्कि हमारे ब्रह्माण्ड के सृजन के अधिष्ठाता हैं । इसी अवस्था से आकाश, समय, पदार्थ, ऊर्जा तथा आगे चलकर तारों, ग्रहों और जीवन का क्रमिक विकास हुआ ।

इन्द्र और वृत्र

वैदिक साहित्य में इन्द्र और वृत्र का युद्ध केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि सृष्टि के विकास का एक प्रतीकात्मक वर्णन माना जाता है । वृत्र उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ ऊर्जा और पदार्थ अभी अव्यक्त अथवा बंधित हैं, जबकि इन्द्र उन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो इस बंधन को तोड़कर सृष्टि के क्रमिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती हैं । ऋग्वेद में वर्णित वृत्र-वध के पश्चात जलों का प्रवाह, प्रकाश का प्राकट्य और जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण इसी प्रक्रिया का प्रतीक है । आधुनिक विज्ञान की भाषा में इन्हें सृष्टि के प्रारम्भिक चरण में कार्यरत दो मूलभूत बलों अथवा प्रक्रियाओं के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है, जिनकी परस्पर क्रिया से ब्रह्माण्ड का क्रमिक विकास संभव हुआ ।