पृष्ठभूमि
मनुष्य की जीवन-यात्रा को अधिक सुरक्षित, सरल और समृद्ध बनाने वाली आर्थिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक तथा सामाजिक उपलब्धियों के समग्र स्वरूप को सभ्यता कहते हैं । सभ्यता केवल भौतिक प्रगति का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का भी परिचायक है जिसके माध्यम से समाज अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और निरंतर विकास की ओर अग्रसर होता है ।
सभ्यता का अध्ययन सामान्यतः व्यापक स्तर पर किया जाता है । इसी कारण हम भारतीय सभ्यता, पश्चिमी सभ्यता, पूर्वी सभ्यता, यूरोपीय सभ्यता, रोमन सभ्यता आदि का उल्लेख करते हैं । प्रत्येक सभ्यता ने अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शासन, व्यापार तथा जीवन-पद्धति का विकास किया ।
भारतीय सभ्यता
भारतीय सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन और निरंतर विकसित होने वाली सभ्यताओं में से एक है । इसकी विशेषता यह रही कि यहाँ भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक विकास को एक-दूसरे का पूरक माना गया । यही कारण है कि भारत ने विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कृषि, शिक्षा, व्यापार, नगर-योजना तथा सामाजिक संगठन जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया ।
सभ्यता और संस्कृति
यद्यपि सभ्यता और संस्कृति शब्दों का प्रयोग प्रायः एक-दूसरे के स्थान पर किया जाता है, परंतु दोनों का अर्थ भिन्न है । सभ्यता किसी समाज के बाह्य विकास का परिचायक है, जबकि संस्कृति उसके आंतरिक विकास का प्रतिबिंब है । दूसरे शब्दों में, सभ्यता हमें यह बताती है कि हमने कैसे जीना सीखा, जबकि संस्कृति यह सिखाती है कि हमें कैसे होना चाहिए ।
किसी समाज की शासन व्यवस्था, नगर-योजना, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, व्यापार, कृषि, चिकित्सा तथा अन्य भौतिक उपलब्धियाँ उसकी सभ्यता का भाग हैं । इसके विपरीत, उसके मूल्य, नैतिक आदर्श, दर्शन, साहित्य, कला, भाषा, परंपराएँ तथा जीवन-दृष्टि उसकी संस्कृति का निर्माण करते हैं ।
भारतीय परंपरा की विशिष्टता यह रही कि यहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास साथ-साथ हुआ । भौतिक समृद्धि को महत्त्व दिया गया, किंतु उसे सदैव नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ संतुलित रखने का प्रयास किया गया । इसी संतुलन ने भारतीय सभ्यता को हजारों वर्षों तक जीवंत, समृद्ध और निरंतर विकसित होने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।