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प्रस्तावना

१९४७ CE में राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात भारत ने राष्ट्र निर्माण का एक नया अध्याय प्रारम्भ किया । संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं, वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा, उद्योग, कृषि तथा आधारभूत संरचना के विकास के माध्यम से देश ने निरन्तर प्रगति की । अनेक चुनौतियों के बावजूद भारत ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित की तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, अंतरिक्ष अनुसंधान और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं ।

राष्ट्र निर्माण

स्वतंत्र भारत के नेतृत्व ने विविध भाषाओं, संस्कृतियों और परम्पराओं से युक्त इस विशाल राष्ट्र को एक सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संगठित किया । कृषि, सिंचाई, ऊर्जा, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्रों में दीर्घकालीन निवेश ने भारत के आधुनिक विकास की आधारशिला रखी । समय के साथ देश ने आत्मनिर्भरता, नवाचार तथा वैश्विक सहयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति की ।

आर्थिक विकास

स्वतंत्रता के समय भारत एक कृषि प्रधान और सीमित औद्योगिक अर्थव्यवस्था था । पिछले सात दशकों में देश ने कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, दूरसंचार तथा अंतरिक्ष विज्ञान में उल्लेखनीय प्रगति की है । आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित है तथा नवाचार, डिजिटल सेवाओं, स्टार्टअप, औषधि निर्माण और अंतरिक्ष अभियानों में अग्रणी देशों में गिना जाता है ।

भारतीय ज्ञान परम्परा का पुनर्जागरण

आधुनिक भारत की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक अपनी प्राचीन ज्ञान परम्परा का पुनर्जागरण है । योग, आयुर्वेद, ध्यान, संस्कृत, वेदान्त तथा भारतीय दर्शन के प्रति विश्वभर में नई रुचि उत्पन्न हुई है । विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा अनेक आध्यात्मिक संगठनों ने इन विषयों पर पुनः अध्ययन और अनुसंधान प्रारम्भ किया है । संयुक्त राष्ट्र द्वारा २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना इस वैश्विक पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण प्रतीक है ।

योग और आध्यात्मिक चेतना

बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी में अनेक आध्यात्मिक गुरुओं ने भारतीय ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया । उन्होंने योग, ध्यान, प्राणायाम तथा मानव मूल्यों को जाति, भाषा, धर्म और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठाकर सम्पूर्ण मानवता तक पहुँचाने का प्रयास किया ।

श्री श्री रविशंकर ने आर्ट ऑफ लिविंग की स्थापना कर सुदर्शन क्रिया, ध्यान तथा मानव मूल्यों के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया । विश्व के १८० से अधिक देशों में उनके कार्यक्रम तनाव-मुक्त जीवन, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा शांति स्थापना के क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं । विभिन्न संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में संवाद और शांति प्रयासों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने ईशा फाउंडेशन के माध्यम से योग, ध्यान, पर्यावरण संरक्षण तथा मानव चेतना के विकास पर व्यापक कार्य किया है । स्वामी रामदेव ने योग और प्राणायाम को घर-घर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा आयुर्वेद और प्राकृतिक स्वास्थ्य के प्रति जनजागरण किया । इनके अतिरिक्त अनेक संतों, आचार्यों तथा संस्थाओं ने भारतीय आध्यात्मिक परम्परा को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है ।

विश्वगुरु की ओर

आज भारत केवल आर्थिक और वैज्ञानिक प्रगति की दिशा में ही अग्रसर नहीं है, बल्कि अपनी प्राचीन ज्ञान परम्परा को आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वित कर मानवता के समक्ष एक समग्र जीवन-दृष्टि प्रस्तुत कर रहा है । योग, आयुर्वेद, ध्यान, मानव मूल्य, सतत विकास तथा वैश्विक शांति जैसे क्षेत्रों में भारत का योगदान निरन्तर बढ़ रहा है । प्राचीन ऋषियों द्वारा आरम्भ की गई ज्ञान-यात्रा आज भी निरन्तर आगे बढ़ रही है और उसका उद्देश्य वही है—सम्पूर्ण मानवता का कल्याण

भारत का शाश्वत संदेश

हजारों वर्षों की इस यात्रा में भारत ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे—ज्ञान और विज्ञान का उत्कर्ष, सांस्कृतिक समृद्धि, विदेशी आक्रमण, संघर्ष, पुनर्जागरण और स्वतंत्रता । फिर भी उसकी मूल चेतना कभी समाप्त नहीं हुई । ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सत्य, धर्म, योग, करुणा और मानव मूल्यों की परम्परा युगों से निरन्तर प्रवाहित होती रही है ।

आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आर्थिक प्रगति को अपनी प्राचीन ज्ञान परम्परा के साथ समन्वित कर रहा है । योग, आयुर्वेद, ध्यान, वेदान्त और मानवीय मूल्यों के माध्यम से वह पुनः सम्पूर्ण मानवता के लिए एक समग्र जीवन-दृष्टि प्रस्तुत कर रहा है । यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है और यही उसकी वैश्विक भूमिका भी है ।

सर्वे भवन्तु सुखिनः ।
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ।
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

यही भारतीय ज्ञान परम्परा का शाश्वत संदेश है—ज्ञान केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का माध्यम है । इसी आदर्श के साथ भारत की यह अनन्त ज्ञान-यात्रा आज भी निरन्तर आगे बढ़ रही है ।