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त्रेता युग

महाभारत में उल्लेख है[1] कि रामायण की घटनाएँ त्रेता युग के अंतिम चरण में घटित हुई थीं । आदि पर्व के अनुसार भगवान राम त्रेता और द्वापर युग की संधि से पूर्व, त्रेता युग की अंतिम शताब्दियों में हुए थे ।

त्रैताद्वापरयोः संधौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।
अस्कृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ।।

लाटदेव के सूर्य सिद्धांत के अनुसार ६० वर्षीय संवत्सर चक्र तथा १२०० वर्षीय युगचक्र का प्रारम्भ लगभग ६७७७ BCE में हुआ था । इस आधार पर त्रेता युग का काल लगभग ६७७७–५५७७ BCE तथा रामायण का काल लगभग ५६७७–५५७७ BCE के बीच, अर्थात् त्रेता युग की अंतिम शताब्दी में, निर्धारित किया जा सकता है ।

खगोल विज्ञान

विभिन्न वैदिक ग्रंथों से स्पष्ट होता है कि ग्रहों, नक्षत्रों तथा उनकी गतियों का ज्ञान भारतीय ऋषियों को कम से कम ऋग्वैदिक काल से था । अरुंधती–वसिष्ठ तथा रोहिणी शकट भेद जैसे खगोलीय अवलोकन संकेत देते हैं कि भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान की व्यवस्थित परम्परा लगभग ९००० BCE से विकसित हो चुकी थी ।

मय के सूर्य सिद्धांत, जिसका काल इस वेबसाइट में लगभग ६७७८ BCE माना गया है, भारतीय खगोल विज्ञान के प्रारम्भिक वैज्ञानिक ग्रंथों में से एक है । इसमें ग्रहों की गति, समय-गणना तथा खगोलीय गणनाओं के अनेक सिद्धांत व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किए गए हैं ।

वामन

भगवान विष्णु के वामन अवतार का जन्म श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को माना जाता है । संस्कृत में वामन का अर्थ है बौना अथवा छोटे कद वाला । पुराणों के अनुसार उन्होंने असुरराज बलि से तीन पग भूमि माँगकर उसके साम्राज्य का अंत किया और देवताओं का राज्य पुनः स्थापित किया ।

विकासवादी दृष्टिकोण से वामन अवतार प्रारम्भिक मानव सभ्यता के उदय का प्रतीक भी माना जा सकता है।

परशुराम

भगवान परशुराम का जन्म त्रेता युग के प्रारम्भ, अर्थात् लगभग ६७०० BCE, में माना जाता है । वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे तथा उनका जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था । वे एक महान योद्धा, तपस्वी और धर्मरक्षक माने जाते हैं, जिन्होंने अत्याचार और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष कर धर्म की पुनः स्थापना का प्रयास किया ।

रावण

परम्परा के अनुसार रावण का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था । लगभग ५६३५ BCE में हैली धूमकेतु का मूल नक्षत्र के समीप दिखाई देना राक्षसों के पतन का एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय संकेत माना जाता है । इस खगोलीय घटना के आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि रावण का जन्म ५६३५ BCE से पूर्व हुआ था ।

हैली धूमकेतु के प्राचीनतम ज्ञात खगोलीय अवलोकनों में से एक रामायण काल से संबंधित माना जाता है । यदि किसी खोज या अवलोकन का नाम उसके प्रथम ज्ञात प्रेक्षक के आधार पर रखा जाता है, तो यह विचारणीय है कि इस धूमकेतु को रामायण धूमकेतु के नाम से भी जाना जा सकता था ।

राजा राम

वैदिक हेरिटेज पोर्टल[2] पर उपलब्ध खगोलीय अध्ययनों के अनुसार, रामायण में वर्णित ग्रह-नक्षत्रों की स्थितियों के आधार पर भगवान श्री राम का जन्म अयोध्या में लगभग ३ फ़रवरी ५६७४ BCE को हुआ माना जाता है । उस समय शनि उच्च राशि में था । भारतीय पंचांग के अनुसार उनका जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को दोपहर लगभग १२ से १ बजे के बीच हुआ था ।

ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः ।
ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥१-१८-८॥
नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पंचसु ।
ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविंदुना सह ॥१-१८-९॥
प्रोद्यमाने जगन्नाथं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
कौसल्याजनयद्रामं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥१-१८-१०॥
विष्णोरर्धं महाभागं पुत्रमैक्ष्वाकुनंदनम् ।
लोहिताक्षं महाबाहुं रक्तौष्ठं दुंदुभिस्वनम् ॥१-१८-११॥

श्री वेदवीर आर्य ने अपने विस्तृत शोध[3] में रामायण में वर्णित ग्रहों, नक्षत्रों, ऋतुओं तथा अन्य खगोलीय संकेतों के आधार पर विभिन्न घटनाओं की तिथियों का पुनर्निर्धारण किया है । उल्लेखनीय है कि ये सभी तिथियाँ परस्पर कालानुक्रमिक रूप से संगत हैं । इससे यह संकेत मिलता है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित घटनाएँ समकालीन खगोलीय अवलोकनों पर आधारित हो सकती हैं, न कि केवल बाद की साहित्यिक कल्पना का परिणाम हैं ।


संदर्भ

  1. The Chronology of India, Vedveer Arya. Manu to Mahabharata, Page 206. https://dokumen.pub/the-chronology-of-india-from-manu-to-mahabharata
  2. Art of Living, Facts About Ramayana. https://www.artofliving.org/in-en/culture/reads/the-facts-about-ram
  3. The Chronology of India, Vedveer Arya. Manu to Mahabharata, Page 205-244. https://dokumen.pub/the-chronology-of-india-from-manu-to-mahabharata