प्रस्तावना
लगभग प्रथम सहस्राब्दी CE के दौरान भारतीय ज्ञान परम्परा ने एक नया रूप धारण किया । पूर्ववर्ती युगों में जहाँ ज्ञान मुख्यतः सूत्रों, उपनिषदों और दार्शनिक ग्रन्थों के माध्यम से व्यक्त किया जाता था, वहीं इस काल में उसे संकेतों, प्रतीकों, पुराण कथाओं, मूर्तियों, मंदिरों, मंत्रों तथा उत्सवों के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाया गया । इसी कारण इस काल को यहाँ सांकेतिक युग कहा गया है ।
इन कथाओं का उद्देश्य केवल मनोरंजन या धार्मिक आस्था उत्पन्न करना नहीं था । इनके भीतर योग, मनोविज्ञान, दर्शन, ब्रह्माण्ड विज्ञान, समाज व्यवस्था तथा मानव चेतना से संबंधित अत्यंत गहन सिद्धांतों को सरल और स्मरणीय रूप में प्रस्तुत किया गया । प्रत्येक देवता, प्रत्येक आयुध, प्रत्येक वाहन, प्रत्येक मुद्रा तथा प्रत्येक कथा किसी न किसी वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक सिद्धांत का संकेत देती है ।
प्रतीकों की भाषा
उदाहरण के लिए, भगवान गणेश की उत्पत्ति की कथा में बताया गया है कि माता शक्ति ने अपने शरीर के उबटन (मल) से गणेश की रचना की । दार्शनिक दृष्टि से यह संकेत करती है कि शक्ति का अपव्यय अहंकार को जन्म देता है । जब यह अहंकार स्वयं को अंतिम सत्य मानकर चेतना (शिव) के मार्ग में अवरोध बनता है, तब शिव उसका मस्तक काट देते हैं । बाद में उसी स्थान पर गजमुख स्थापित किया जाता है, जो विशाल बुद्धि, संवेदनशीलता, धैर्य और विवेक का प्रतीक है । इस प्रकार कथा यह संदेश देती है कि आध्यात्मिक विकास के लिए अहंकार का रूपान्तरण आवश्यक है; उसका विनाश नहीं, बल्कि उसका उच्चतर बुद्धि में परिवर्तन ही वास्तविक मुक्ति है ।
इसी प्रकार समुद्र मंथन, शिव का ताण्डव, दुर्गा के नौ रूप, विष्णु के अवतार, शिवलिंग, श्री यंत्र, नटराज, नाग, कमल, चक्र, त्रिशूल और अनेक अन्य प्रतीक भी मानव जीवन तथा ब्रह्माण्ड के गहन सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन संकेतों की भाषा ने वैदिक ज्ञान को हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखा और उसे प्रत्येक पीढ़ी तक पहुँचाने का कार्य किया ।
इस युग की प्रमुख उपलब्धियाँ
इसी काल में हठयोग और तंत्र परम्परा का व्यवस्थित विकास हुआ, अद्वैत वेदान्त का पुनरुत्थान हुआ, गणित और खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त तथा वराहमिहिर जैसे महान विद्वानों ने अभूतपूर्व योगदान दिया, आयुर्वेद का और अधिक विकास हुआ तथा संस्कृत साहित्य, मंदिर स्थापत्य, संगीत और कला ने अपने स्वर्णिम युग में प्रवेश किया ।
इस प्रकार सांकेतिक युग भारतीय सभ्यता का वह काल था जिसमें प्राचीन वैदिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिए उसे प्रतीकों, कथाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया गया, जबकि साथ ही गणित, विज्ञान, चिकित्सा, योग और दर्शन के क्षेत्रों में निरन्तर नवीन अनुसंधान भी चलते रहे ।