प्रस्तावना
वैदिक काल में योग का मुख्य उद्देश्य मानव चेतना के उच्चतम स्तर का प्रत्यक्ष अनुभव करना था । उपनिषदों, दर्शनशास्त्र और योगसूत्रों ने इस अनुभव के सिद्धांतों का विस्तृत वर्णन किया । सांकेतिक युग में इन्हीं सिद्धांतों को सामान्य साधकों के लिए अधिक व्यावहारिक बनाया गया । इसी काल में हठयोग, तंत्र, कुण्डलिनी, चक्र, नाड़ी, मुद्रा तथा बन्ध जैसे विषयों का व्यवस्थित विकास हुआ ।
इस काल की विशेषता यह थी कि योग केवल दार्शनिक विचार न रहकर एक प्रयोगात्मक विज्ञान बन गया । शरीर, प्राण, मन और चेतना के पारस्परिक संबंधों का गहन अध्ययन किया गया तथा ऐसी साधना-पद्धतियाँ विकसित की गईं, जिनके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं इन अनुभवों तक पहुँच सके ।
तंत्र परम्परा
संस्कृत में तंत्र का अर्थ है विस्तार, तंत्र (प्रणाली) या विधि । तंत्र का उद्देश्य किसी विशेष शक्ति या सिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि चेतना के विस्तार की वैज्ञानिक विधियाँ प्रदान करना है । इसमें मानव शरीर को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना गया है । यही कारण है कि वैदिक सूत्र यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे तांत्रिक परम्परा का भी मूल आधार है ।
तंत्र परम्परा में शिव को शुद्ध चेतना और शक्ति को सृष्टि की गतिशील ऊर्जा माना गया । सम्पूर्ण साधना का उद्देश्य शक्ति को उसके मूल स्रोत शिव में पुनः स्थापित करना है । इसी सिद्धांत को कुण्डलिनी जागरण, चक्र साधना, मंत्र, यंत्र तथा विभिन्न ध्यान-पद्धतियों के माध्यम से व्यवहारिक रूप दिया गया ।
हठयोग
हठयोग का व्यवस्थित विकास इसी काल में हुआ । परम्परा के अनुसार इसका ज्ञान भगवान शंकर से मत्स्येन्द्रनाथ और उनके शिष्य गोरक्षनाथ तक पहुँचा । हठयोग का उद्देश्य केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि शरीर और प्राण को इस प्रकार संतुलित करना है कि साधक सहज रूप से उच्च ध्यान अवस्थाओं में प्रवेश कर सके ।
हठयोग में आसन, प्राणायाम, षट्कर्म, मुद्रा, बन्ध तथा ध्यान की अनेक विधियों का विकास हुआ । इनका उद्देश्य शरीर को स्वस्थ बनाना भर नहीं है, बल्कि नाड़ियों का शुद्धीकरण, प्राण प्रवाह का संतुलन तथा चेतना के क्रमिक उत्कर्ष की तैयारी करना है । इस प्रकार हठयोग, राजयोग की उच्च अवस्थाओं की आधारभूमि बनता है ।
नाथ सम्प्रदाय
मत्स्येन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ द्वारा स्थापित नाथ परम्परा ने हठयोग को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में व्यवस्थित रूप से फैलाया । इस परम्परा ने योग को केवल आश्रमों तक सीमित न रखकर सामान्य समाज तक पहुँचाया । आज विश्वभर में प्रचलित अधिकांश हठयोग परम्पराएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसी परम्परा से प्रभावित हैं ।
योग का उद्देश्य
वैदिक परम्परा में योग का उद्देश्य शरीर को लचीला बनाना या केवल रोगों से मुक्ति पाना नहीं है । उसका अंतिम लक्ष्य साधक को अपनी वास्तविक प्रकृति का प्रत्यक्ष अनुभव कराना है । हठयोग शरीर और प्राण को तैयार करता है, राजयोग मन को स्थिर करता है, और अंततः साधक अद्वैत की उस अवस्था में स्थापित होता है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद समाप्त हो जाता है ।