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प्रस्तावना

Sanskriti

सांकेतिक युग केवल विज्ञान, योग और दर्शन के विकास का काल नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति के स्वर्णिम उत्कर्ष का भी युग था । इसी काल में संस्कृत साहित्य, मंदिर स्थापत्य, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला तथा चित्रकला ने अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं । भारतीय ऋषियों और आचार्यों ने यह अनुभव किया कि प्रत्येक व्यक्ति गहन दर्शन या विज्ञान का अध्ययन नहीं कर सकता । इसलिए उन्होंने ज्ञान को साहित्य, कला, संगीत और स्थापत्य के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का मार्ग अपनाया ।

भारतीय परम्परा में कला का उद्देश्य केवल सौन्दर्य की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सत्य की अनुभूति कराना था । मंदिर, मूर्तियाँ, चित्र, नृत्य, संगीत और काव्य—सभी आध्यात्मिक तथा वैज्ञानिक सिद्धांतों के प्रतीकात्मक माध्यम थे ।

संस्कृत साहित्य

इस काल में संस्कृत साहित्य अपने स्वर्ण युग में पहुँचा । महाकवि कालिदास ने रघुवंश, कुमारसम्भव, मेघदूत तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम् जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना की । इसके अतिरिक्त भारवि, माघ, भास, भवभूति, दण्डी तथा बाणभट्ट जैसे महान साहित्यकारों ने भारतीय काव्य, नाटक और गद्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया । इन रचनाओं में केवल साहित्यिक सौन्दर्य ही नहीं, बल्कि दर्शन, नीति, मनोविज्ञान, इतिहास तथा प्रकृति का भी अद्भुत समन्वय मिलता है ।

मंदिर स्थापत्य

इस काल में भारतीय मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं रहे, बल्कि ज्ञान, शिक्षा, संगीत, कला तथा सामाजिक जीवन के प्रमुख केन्द्र बन गए । उत्तर भारत में नागर शैली, दक्षिण भारत में द्रविड़ शैली तथा मध्य भारत में वेसर शैली का विकास हुआ । मंदिरों की प्रत्येक योजना, अनुपात, शिखर, गर्भगृह तथा मूर्तिकला वैदिक ज्यामिति, मंडल सिद्धांत और ब्रह्माण्डीय संरचना पर आधारित थी ।

अजन्ता, एलोरा, महाबलीपुरम्, कैलासनाथ तथा अनेक अन्य मंदिर और गुफाएँ भारतीय स्थापत्य, अभियांत्रिकी तथा शिल्पकला की अद्भुत उपलब्धियाँ हैं । इनका निर्माण आधुनिक उपकरणों के अभाव में भी अत्यंत सूक्ष्म ज्यामितीय और संरचनात्मक सिद्धांतों के आधार पर किया गया था ।

संगीत और नृत्य

भारतीय परम्परा में संगीत को नाद ब्रह्म कहा गया है । यह माना गया कि सम्पूर्ण सृष्टि मूलतः कंपन से बनी है और संगीत उसी सार्वभौमिक कंपन की अभिव्यक्ति है । इस काल में स्वर, राग, ताल तथा लय का व्यवस्थित विकास हुआ । भरतमुनि के नाट्यशास्त्र ने संगीत, नृत्य और नाटक के सिद्धांतों को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया, जो आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की आधारशिला बने ।

नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि योग, ध्यान तथा आध्यात्मिक अनुभूति की अभिव्यक्ति माना जाता था । प्रत्येक मुद्रा, हस्तमुद्रा, नेत्र संचालन तथा भाव किसी न किसी दार्शनिक या मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते थे ।

कला और मूर्तिकला

भारतीय मूर्तिकला और चित्रकला का उद्देश्य किसी व्यक्ति का यथार्थ चित्रण करना नहीं, बल्कि उसके आंतरिक गुणों और चेतना का प्रतीकात्मक रूप प्रस्तुत करना था । इसी कारण विभिन्न देवताओं के अनेक हाथ, अनेक आयुध, वाहन, मुद्राएँ तथा अलंकरण दिखाई देते हैं । इनमें से प्रत्येक किसी विशेष शक्ति, गुण या प्राकृतिक सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है ।

उदाहरण के लिए, नटराज का ताण्डव सृष्टि, स्थिति और संहार के शाश्वत चक्र का प्रतीक है । गणेश का गजमुख विवेक, संवेदनशीलता और विशाल बुद्धि का संकेत देता है । सरस्वती ज्ञान और कला का, लक्ष्मी समृद्धि का तथा दुर्गा आंतरिक शक्ति का प्रतीक हैं । इस प्रकार भारतीय कला प्रतीकों की एक ऐसी भाषा बन गई जिसने गहन दार्शनिक सिद्धांतों को सामान्य जन तक सहज रूप से पहुँचा दिया ।

विश्व को योगदान

सांकेतिक युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि इसने ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहने दिया । उसे साहित्य, संगीत, नृत्य, स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, उत्सवों और लोक परम्पराओं के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाया गया । इसी कारण भारतीय सभ्यता अनेक आक्रमणों और सामाजिक परिवर्तनों के बावजूद हजारों वर्षों तक अपनी सांस्कृतिक निरन्तरता बनाए रखने में सफल रही ।