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अद्वैत वेदान्त

वेदान्त का अर्थ है वेदों का सार अथवा ज्ञान की अंतिम अवस्था । उपनिषदों में प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धांत है कि सम्पूर्ण सृष्टि का आधार एक ही परम सत्य है, जिसे ब्रह्म कहा गया है । जीव, जगत और ईश्वर उसी एक सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं । मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर, मन या बुद्धि नहीं, बल्कि वही शुद्ध चेतना है । इसलिए अद्वैत वेदान्त का लक्ष्य किसी नए सत्य की खोज नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान करना है ।

महावाक्यों की यात्रा

वैदिक शिक्षा केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं थी, बल्कि आत्मानुभूति की क्रमिक यात्रा थी । उपनिषदों के चार महावाक्य इस सम्पूर्ण यात्रा का सार प्रस्तुत करते हैं ।

आदि शंकराचार्य

आठवीं शताब्दी CE में आदि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त को पुनः व्यवस्थित रूप से स्थापित किया । उन्होंने उपनिषदों, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर वेदान्त को सुदृढ़ दार्शनिक आधार प्रदान किया । भारतवर्ष की व्यापक यात्राओं और शास्त्रार्थों के माध्यम से उन्होंने वैदिक ज्ञान का पुनर्जागरण किया तथा चार प्रमुख मठों की स्थापना कर इस परम्परा को संगठित स्वरूप दिया ।

अद्वैत का सार

अद्वैत वेदान्त के अनुसार समस्त सृष्टि एक ही चेतना की अभिव्यक्ति है । भिन्नता केवल नाम, रूप और अनुभव के स्तर पर दिखाई देती है । जब अज्ञान दूर हो जाता है, तब साधक अनुभव करता है कि वही चेतना उसके भीतर, प्रत्येक जीव में और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समान रूप से विद्यमान है । यही आत्मसाक्षात्कार वेदान्त की अंतिम उपलब्धि है ।