राजा परीक्षित
राजा परीक्षित, अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे । उनका जन्म महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में हुआ था और वे कुरुवंश के अंतिम महान सम्राट माने जाते हैं । श्री कृष्ण की कृपा से वे अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से सुरक्षित बचे थे ।
महाभारत युद्ध के पश्चात उन्होंने लगभग ६० वर्षों तक राज्य किया । उनके शासनकाल में युद्ध से प्रभावित भारतवर्ष का पुनर्गठन हुआ तथा राजनीतिक स्थिरता पुनः स्थापित हुई । लगभग ३०४३ BCE में ९६ वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ ।
राजा जनमेजय
राजा जनमेजय, परीक्षित के पुत्र थे । लगभग २५ वर्ष की आयु में वे हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठे । उनके शासनकाल में कुरुवंश पुनः संगठित हुआ और वैदिक परम्पराओं के संरक्षण को विशेष महत्व दिया गया ।
जनमेजय अपने प्रसिद्ध सर्पसत्र यज्ञ के लिए जाने जाते हैं, जिसका आयोजन उन्होंने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से किया था । इसी यज्ञ के अवसर पर महर्षि वैशम्पायन ने महाभारत का प्रथम सार्वजनिक पाठ किया, जिसके माध्यम से यह महाकाव्य व्यापक रूप से जनसामान्य तक पहुँचा ।
पुराण परम्परा
महर्षि वैशम्पायन से प्राप्त महाभारत का वर्णन बाद में सूत उग्रश्रवाः सौति ने नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों के समक्ष किया । इसी गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से महाभारत और पुराण साहित्य का व्यापक प्रसार हुआ ।
पुराण साहित्य
कलियुग के प्रारम्भिक काल में वैदिक ज्ञान, वंशावलियों तथा ऐतिहासिक घटनाओं का व्यवस्थित संकलन पुराणों के रूप में विकसित हुआ । इन ग्रंथों ने भारतीय इतिहास, भूगोल, राजवंशों तथा सांस्कृतिक परम्पराओं को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
नैमिषारण्य
नैमिषारण्य इस काल का प्रमुख वैदिक अध्ययन केन्द्र था । यहाँ अनेक ऋषियों के सम्मेलन आयोजित हुए, जिनमें वेद, पुराण, इतिहास तथा दर्शन से संबंधित विषयों पर विचार-विमर्श होता था ।
संदर्भ
- Art of Living, Ancient Mathematical Genius. https://www.artofliving.org/in-en/culture/amazing-india/how-ancient-mathemetical-genius-began-in-india