cKlear
Email

धर्म

वैदिक ज्ञान में धर्म का अर्थ किसी संप्रदाय या मत से नहीं, बल्कि किसी वस्तु, जीव अथवा सम्पूर्ण सृष्टि की मौलिक प्रकृति से है । प्रत्येक वस्तु का अपना स्वाभाविक गुण और आचरण होता है, जिसे उसका धर्म कहा जाता है । जैसे अग्नि का धर्म जलाना, जल का धर्म प्रवाहित होना और पृथ्वी का धर्म स्थिरता प्रदान करना है ।

भारतीय दर्शन में सत्य को जानने के अनेक मार्ग बताए गए हैं । इनमें से एक मार्ग विज्ञान है, जो अवलोकन, प्रयोग और तर्क के माध्यम से प्रकृति के नियमों को समझने का प्रयास करता है । विज्ञान भौतिक जगत् के अध्ययन का एक प्रभावी साधन है, किन्तु उसकी पहुँच मुख्यतः प्रत्यक्ष और मापे जा सकने वाले संसार तक ही सीमित रहती है ।

वैदिक परम्परा के षड्दर्शन सत्य की खोज के लिए अनेक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं । इनमें तर्क, अनुभव, आत्मनिरीक्षण, योग और प्रत्यक्ष अनुभूति सभी का अपना-अपना स्थान है । इसलिए परब्रह्म, चेतना और अस्तित्व के अंतिम सत्य को जानने के लिए केवल विज्ञान ही पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि ज्ञान, साधना और प्रत्यक्ष अनुभव को भी समान रूप से आवश्यक माना गया है ।

भारतीय ऋषियों ने प्रकृति और चेतना के इन नियमों का गहन अध्ययन कर अनेक मंत्र (सूत्र) प्रतिपादित किए । इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर विभिन्न तंत्र (प्रणालियाँ) विकसित हुईं और उनसे अनेक यंत्र (उपकरण) निर्मित हुए ।

समय, स्थान और संस्कृति के अनुसार विभिन्न महापुरुषों ने इन्हीं सनातन सिद्धांतों की अपने-अपने ढंग से व्याख्या की । इन्हीं व्याख्याओं और परम्पराओं से हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई, इस्लाम तथा अन्य धार्मिक परम्पराओं का विकास हुआ । इसलिए वैदिक दृष्टि से वास्तविक धर्म कोई विशेष संप्रदाय नहीं, बल्कि वह सनातन नियम है जो सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करता है । विभिन्न धर्म उसी सनातन धर्म की विविध व्याख्याएँ और साधना-पद्धतियाँ हैं ।

कर्म

वैदिक दर्शन में कर्म केवल किसी कार्य को करने का नाम नहीं है । प्रत्येक कर्म के तीन प्रमुख अंग होते हैं—भाव, क्रिया और फल । दूसरे शब्दों में, किसी भाव से प्रेरित होकर की गई शास्त्रविहित क्रिया कर्म कहलाती है । किसी कर्म का फल केवल की गई क्रिया पर ही नहीं, बल्कि उसके पीछे के भाव और उसे करने की विधि पर भी निर्भर करता है ।

कर्म एक चक्र का निर्माण करता है । एक कर्म का फल नए भावों और इच्छाओं को जन्म देता है, जो आगे चलकर नई क्रियाओं के लिए प्रेरित करते हैं । यही कर्मबंधन है ।

जब हम अपने नियत कर्म को उसके फल की आसक्ति से मुक्त होकर करते हैं और परिणामों में उलझे बिना अगले नियत कर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं, तब वह अकर्म कहलाता है । कर्म करते हुए भी उसके बंधन से मुक्त रहना ही अकर्म का वास्तविक स्वरूप है । यही मुक्ति का मार्ग है ।

जब कामना इतनी प्रबल हो जाती है कि व्यक्ति धर्म और अधर्म का विचार किए बिना कर्म करने लगता है, तब वह विकर्म कहलाता है । ऐसे कर्म स्वयं के लिए भी और समाज के लिए भी दुःख तथा बंधन का कारण बनते हैं ।

भक्ति

किसी सांसारिक वस्तु, व्यक्ति या विचार पर विश्वास आस्था कहलाता है, जबकि परब्रह्म के अस्तित्व, उसकी उपस्थिति और उसकी करुणा पर विश्वास भक्ति है । जब हमें यह अनुभव होने लगता है कि इस सृष्टि का संचालन किसी व्यापक और दिव्य चेतना द्वारा हो रहा है, तब उसके प्रति स्वाभाविक प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का भाव जागृत होता है । इसी असीम प्रेम और समर्पण को भक्ति कहते हैं ।

भक्ति की परिपक्व अवस्था में भक्त प्रत्येक प्राणी और सम्पूर्ण सृष्टि में उसी एक परम चेतना का दर्शन करने लगता है । तब उसके भीतर अपने और दूसरों के बीच का भेद धीरे-धीरे मिटने लगता है । अंततः वह अनुभव करता है कि वही परम चेतना उसके भीतर भी विद्यमान है । यही भक्ति की पराकाष्ठा है ।

ज्ञान

संस्कृत में ज्ञान का अर्थ केवल जानकारी या तथ्यों का संग्रह नहीं है । ज्ञान वह प्रत्यक्ष बोध है जिसमें किसी वस्तु, विषय अथवा सत्य का वास्तविक स्वरूप स्वयं प्रकट हो जाता है । यह बुद्धि, स्मृति और अवधारणाओं से परे शुद्ध अनुभूति है ।

किसी विषय के संबंध में प्राप्त तथ्य, सूचना अथवा अध्ययन जानकारी कहलाते हैं । जानकारी स्मृति और बुद्धि पर आधारित होती है तथा समय के साथ बदल भी सकती है । इसके विपरीत ज्ञान किसी बाहरी प्रमाण या स्मरण पर निर्भर नहीं करता, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव से उत्पन्न होता है ।

वैदिक दर्शन के अनुसार परब्रह्म, आत्म तथा अस्तित्व के अंतिम सत्य को केवल ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है । शास्त्र, गुरु, तर्क और साधना इस दिशा में मार्गदर्शन करते हैं, किन्तु अंतिम सत्य का प्रत्यक्ष बोध प्रत्येक साधक को स्वयं करना होता है ।

सत्य

वह जो समय, स्थान और परिस्थितियों से अप्रभावित है तथा जिसका कभी क्षय नहीं होता, वही सत्य है । वैदिक दर्शन के अनुसार आत्म और परब्रह्म ही परम सत्य हैं । इसके विपरीत जो समय के साथ उत्पन्न होता है, परिवर्तित होता है और नष्ट हो जाता है, वह परिवर्तनशील प्रकृति का भाग है ।

व्यावहारिक जीवन में हम प्रायः तथ्यों के साथ कार्य करते हैं । तथ्य अवलोकन, अनुभव अथवा प्रमाण पर आधारित होते हैं और समय, स्थान तथा परिस्थितियों के अनुसार बदल भी सकते हैं । सत्य बोलने का अर्थ है—इन तथ्यों को बिना विकृति, भय, लोभ या स्वार्थ के उसी रूप में प्रस्तुत करना जैसा वे हमारे ज्ञान में हैं ।

आध्यात्मिक साधना में सत्य केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि साधना की दिशा है । साधक को बार-बार यह विवेक करना होता है कि उसके विचार, निर्णय और कर्म अल्पकालिक लाभ की ओर ले जा रहे हैं या दीर्घकालिक कल्याण की ओर । जिस परिणाम का प्रभाव जितना अधिक स्थायी और व्यापक होता है, वह उतना ही सत्य के निकट माना जाता है । इस प्रकार साधक क्षणिक सुखों से ऊपर उठते हुए क्रमशः परम सत्य की ओर अग्रसर होता है ।