पृष्ठभूमि
हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ—दृष्टि, श्रवण, स्वाद, गंध और स्पर्श—जीवन के विकास के साथ विकसित हुई हैं । इनके माध्यम से हम अपने चारों ओर के भौतिक संसार का अनुभव करते हैं तथा शरीर, श्वास और मन से संबंधित सूचनाएँ प्राप्त करते हैं । ये इन्द्रियाँ हमारे अस्तित्व को समझने का एक महत्त्वपूर्ण साधन हैं, किन्तु उनकी पहुँच केवल स्थूल जगत् तक ही सीमित है ।
वैदिक दर्शन के अनुसार मानव अस्तित्व केवल शरीर तक सीमित नहीं है । शरीर के अतिरिक्त हमारे भीतर श्वास, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और आत्म जैसे सूक्ष्म आयाम भी विद्यमान हैं । जैसे-जैसे साधक इन आयामों को समझता और उनका अनुभव करता है, वैसे-वैसे वह अपने वास्तविक स्वरूप के निकट पहुँचता है ।
शरीर
शरीर हमारे अस्तित्व का सबसे स्थूल आयाम है । सामान्य अर्थों में यह हमारे सभी अंग-प्रत्यंगों का समुच्चय है । वैदिक दर्शन में इसे अन्नमय कोष कहा गया है, क्योंकि इसका निर्माण और पोषण अन्न से होता है ।
जन्म के समय हमारे शरीर का भार लगभग २–३ किलोग्राम होता है । समय के साथ भोजन और जल के माध्यम से यह कई गुना बढ़ जाता है । इससे स्पष्ट होता है कि शरीर का अधिकांश भाग जीवन भर अर्जित किया गया है । जो वस्तु हमने समय के साथ एकत्र की है, वह हमारी हो सकती है, किन्तु वह स्वयं हम नहीं हो सकती ।
शरीर हमारे अनुभव का आधार है और इसकी उचित देखभाल आवश्यक है । योग, संतुलित आहार, पर्याप्त विश्राम तथा शारीरिक श्रम शरीर को स्वस्थ रखते हैं, जिससे साधक अपने अस्तित्व के सूक्ष्म आयामों की ओर सहजता से अग्रसर हो सकता है ।
श्वास
श्वास, जिसे प्राणमय कोष भी कहते हैं, शरीर और मन के बीच का सेतु है । जब तक श्वास चलती है, तब तक शरीर में जीवन विद्यमान रहता है । योग में श्वास को केवल वायु का आवागमन नहीं, बल्कि प्राण के प्रवाह का माध्यम माना गया है ।
ऑक्सीजन, जो प्राण का एक प्रमुख अंश है, हमारे शरीर से लगभग ८०% विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करती है । इसलिए श्वास केवल जीवन बनाए रखने का साधन नहीं, बल्कि शरीर की शुद्धि और संतुलन का भी महत्त्वपूर्ण आधार है ।
हम जानते हैं कि हमारे शरीर के निर्माण खंड—जैसे प्रोटीन, वसा और कार्बोहाइड्रेट—मुख्यतः हाइड्रोकार्बन यौगिक हैं । ऑक्सीजन की उपस्थिति में इनके चयापचय से ऊर्जा, जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है । यदि पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध न हो, तो अपूर्ण दहन के कारण कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे विषैले पदार्थ भी बन सकते हैं । इस प्रकार स्वस्थ श्वास शरीर की प्रत्येक कोशिका के सुचारु कार्य के लिए आवश्यक है ।
योग में प्राणायाम का उद्देश्य केवल श्वास को नियंत्रित करना नहीं है । नियमित अभ्यास से श्वास गहरी, शांत और लयबद्ध होती है, जिसका सकारात्मक प्रभाव शरीर, मन और सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ता है ।
मन
मन, जिसे मनोमय कोष भी कहते हैं, हमारे अस्तित्व का वह आयाम है जिसके माध्यम से हम अनुभव करते हैं, विचार करते हैं, कल्पना करते हैं तथा निर्णय लेने का प्रयास करते हैं । हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त सूचनाएँ मन तक पहुँचती हैं और मन उनका विश्लेषण करके उपयुक्त प्रतिक्रिया देने का प्रयास करता है ।
यदि हम जीवन के विकास को देखें, तो प्रत्येक जीव अपने अनुभवों से सीखता आया है । किसी क्रिया के बाद प्राप्त परिणाम को स्मरण रखकर भविष्य में वैसी ही परिस्थिति आने पर वही या उससे भिन्न प्रतिक्रिया देना मन की एक महत्त्वपूर्ण क्षमता है । दूसरे शब्दों में, मन हमें अतीत से सीखने और भविष्य के लिए बेहतर निर्णय लेने में सहायता करता है ।
आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह प्रक्रिया हमारे तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क के विशाल तंत्रिका नेटवर्क के माध्यम से सम्पन्न होती है । वैदिक दर्शन इसे मन की कार्यप्रणाली के रूप में देखता है । मन निरंतर बाहरी संसार से प्राप्त अनुभवों और आंतरिक विचारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता रहता है ।
किन्तु मन की अपनी सीमाएँ भी हैं । वह सामान्यतः उन्हीं अनुभवों से सीख सकता है जिनमें किसी क्रिया और उसके परिणाम के बीच स्पष्ट संबंध दिखाई देता है । जब परिणाम बहुत देर से प्राप्त होता है, तब मन उस संबंध को सहज रूप से नहीं समझ पाता । यही कारण है कि मन अनेक बार तात्कालिक सुख को दीर्घकालिक हित से अधिक महत्त्व देने लगता है ।
बुद्धि
मन की इसी सीमा को संतुलित करने के लिए बुद्धि का विकास हुआ । बुद्धि, जिसे ज्ञानमय कोष भी कहते हैं, वह क्षमता है जो हमें उचित और अनुचित, हित और अहित तथा तात्कालिक और दीर्घकालिक परिणामों के बीच विवेक करने में समर्थ बनाती है ।
मन तत्काल मिलने वाले सुख की ओर आकर्षित हो सकता है, जबकि बुद्धि भविष्य के परिणामों का विचार करती है । उदाहरण के लिए, स्वादिष्ट किन्तु अस्वास्थ्यकर भोजन मन को अच्छा लग सकता है, परन्तु बुद्धि हमें उसके दीर्घकालिक प्रभावों का स्मरण कराकर संयम रखने की प्रेरणा देती है ।
बुद्धि केवल ज्ञान का संग्रह नहीं है, बल्कि सही समय पर उस ज्ञान का उचित उपयोग करने की क्षमता भी है । यही विवेक मनुष्य को अन्य जीवों से विशिष्ट बनाता है और उसे अपने जीवन का सचेतन निर्माण करने की सामर्थ्य प्रदान करता है । योग में बुद्धि को निर्मल और स्थिर बनाने पर विशेष बल दिया गया है, क्योंकि शुद्ध बुद्धि ही सत्य को पहचानने में समर्थ होती है ।
चित्त
चित्त को सामान्यतः स्मृति के रूप में समझा जा सकता है, किन्तु इसका अर्थ केवल हमारी जागरूक याददाश्त तक सीमित नहीं है । चित्त में वे सभी संस्कार, अनुभव और स्मृतियाँ संचित रहती हैं जो हमारे प्रत्येक कर्म और अनुभव से उत्पन्न होती हैं ।
हमारे शरीर का प्रत्येक कोशिकीय निर्माण, हमारी आदतें, प्रवृत्तियाँ और यहाँ तक कि हमारा DNA भी एक प्रकार की स्मृति का उदाहरण माना जा सकता है । वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार हमारा सम्पूर्ण शरीर और व्यक्तित्व हमारे पूर्व कर्मों और संस्कारों की अभिव्यक्ति है ।
दूसरे शब्दों में, चित्त हमारे जीवन का संग्रहालय है । मन वर्तमान में कार्य करता है, बुद्धि निर्णय लेती है, किन्तु चित्त उन सभी अनुभवों का भंडार है जिनके आधार पर हमारा व्यवहार और व्यक्तित्व निर्मित होता है । योग और ध्यान के अभ्यास द्वारा चित्त की अशुद्धियों का शोधन किया जा सकता है, जिससे साधक अधिक स्वतंत्र, शांत और जागरूक जीवन जीने लगता है ।
अहंकार
अहंकार हमारे अस्तित्व का वह आयाम है जो हमें हमारी पहचान का बोध कराता है । अहंकार शब्द अहम् और कार से मिलकर बना है । अहम् का अर्थ है मैं और कार का अर्थ है करने वाला । अर्थात् अहंकार वह भावना है जो हमें यह अनुभव कराती है कि मैं करता हूँ, मैं सोचता हूँ और मैं ही इस शरीर और मन का स्वामी हूँ ।
अहंकार का अर्थ केवल घमण्ड नहीं है । यह हमारी प्रत्येक पहचान का आधार है—जैसे मेरा शरीर, मेरा परिवार, मेरा समाज, मेरा धर्म, मेरा ज्ञान अथवा मेरा पद । यही पहचान हमें संसार में अपनी भूमिका निभाने में सहायता करती है, किन्तु जब यही पहचान अत्यधिक प्रबल हो जाती है, तब वही बन्धन और दुःख का कारण भी बन सकती है ।
अद्वैत वैदिक दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि एक ही सार्वभौमिक चेतना की अभिव्यक्ति है । अहंकार हमें इस एकत्व का अनुभव नहीं होने देता और हमें स्वयं को अन्य लोगों तथा प्रकृति से पृथक् अनुभव कराता है । इसी भेदबुद्धि से राग, द्वेष, श्रेष्ठता, हीनता, भय, अपराधबोध तथा अनेक मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं ।
योग और ध्यान का उद्देश्य अहंकार का विनाश करना नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं को समझना है । जब साधक यह अनुभव करता है कि प्रकृति अपने नियमों के अनुसार कार्य कर रही है और वह स्वयं उन सबका साक्षी है, तब कर्तापन का भाव धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है ।
आत्म
आत्म, जिसे आनन्दमय कोष भी कहते हैं, हमारे अस्तित्व का सबसे सूक्ष्म और मूलभूत आयाम है । शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार निरन्तर परिवर्तनशील हैं, किन्तु आत्म इन सभी परिवर्तनों का साक्षी है । वही हमारे अस्तित्व का शाश्वत तत्त्व है, जिसका कभी जन्म नहीं होता और जिसका कभी विनाश नहीं होता ।
जब हम कहते हैं "मेरा शरीर", "मेरा मन" अथवा "मेरी बुद्धि", तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि यह "मैं" कौन है जो इन सबको अपना कह रहा है । वैदिक दर्शन इसी मैं को आत्म कहता है । आत्म न शरीर है, न मन है और न ही अहंकार; वह इन सभी का साक्षी है ।
अपने वास्तविक स्वरूप को जाने बिना न तो हम स्वयं को पूर्णतः समझ सकते हैं और न ही इस सृष्टि अथवा परमेश्वर को । जब तक आत्म का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होता, तब तक ईश्वर हमारे लिए केवल एक विचार या विश्वास बना रहता है । आत्म के अनुभव के साथ ही साधक को यह ज्ञात होने लगता है कि वही चेतना सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है ।
योग, ध्यान और आत्मचिन्तन का अंतिम उद्देश्य आत्म का प्रत्यक्ष अनुभव करना है । जैसे-जैसे साधक शरीर से लेकर आत्म तक अपने अस्तित्व के प्रत्येक आयाम को समझता और अनुभव करता है, वैसे-वैसे उसका जीवन अधिक शांत, जागरूक और आनन्दमय होता जाता है । यही आत्मज्ञान की दिशा में पहला वास्तविक कदम है ।