मनु वंश
प्राचीन भारतीय इतिहास[1] की वंशावली परम्परा स्वायंभुव मनु से प्रारम्भ होती है, जिन्हें ब्रह्मावर्त का प्रथम राजा माना जाता है । वैदिक परम्परा के अनुसार वे वैदिक ज्ञान के प्रवर्तक ब्रह्मा के पुत्र थे । यद्यपि उनसे पूर्व भी अनेक समुदाय, शासक और राज्य रहे होंगे, परन्तु भारतीय राजवंशों तथा उनके इतिहास का व्यवस्थित अभिलेखन स्वायंभुव मनु से प्रारम्भ माना जाता है ।
मनु तथा पुरु वंशों की बहुपीढ़ीगत वंशावलियों और ऐतिहासिक घटनाओं को संरक्षित रखने का उत्तरदायित्व सूतों और मागधों को सौंपा गया था । बाद के ऋग्वैदिक काल में महर्षि वेदव्यास के शिष्य रोमहर्षण ने इन परम्पराओं का प्रथम व्यवस्थित संकलन पुराण-इतिहास संहिता के रूप में किया । आगे चलकर इन्हीं संहिताओं का लौकिक संस्कृत में पुनः संकलन हुआ, जिन्हें आज पुराण के नाम से जाना जाता है ।
भारतीय परम्परा में मनु नाम से अनेक राजाओं का उल्लेख मिलता है । इसलिए प्रथम मनु को अन्य मनुओं से पृथक् पहचान देने के लिए स्वायंभुव मनु अथवा मनु प्रथम कहा गया है । उनके शासनकाल में भारतीय खगोलशास्त्र के प्रथम आचार्य ब्रह्मा प्रथम ने प्रारम्भिक खगोलीय सिद्धांतों का प्रतिपादन किया । उन्होंने पाँच वर्षीय युगचक्र, माघ शुक्लादि चन्द्र-सौर पंचांग तथा पैतामह सिद्धांत की स्थापना की । उनके अनुसार संवत्सर का आरम्भ माघ शुक्ल प्रतिपदा को धनिष्ठा नक्षत्र से होता था । आधुनिक खगोलशास्त्र के आधार पर भी लगभग १५०००–१४००० BCE के बीच ग्रीष्म संक्रांति का धनिष्ठा नक्षत्र के समीप होना इस काल-निर्धारण के अनुरूप माना जाता है ।
पुराणों में कुल १४ मनुओं का वर्णन मिलता है, जिनमें सात भावी मनुओं का भी उल्लेख है । इस वेबसाइट में प्रस्तुत कालक्रम के अनुसार स्वायंभुव मनु से वैवस्वत मनु तक का काल लगभग १४५००–११२०० BCE के बीच माना गया है ।
देवासुर संग्राम
देवता और असुर महर्षि कश्यप के दो प्रमुख वंश थे । कश्यप की पत्नी अदिति से उत्पन्न संतानों के वंशज देवता तथा पत्नी दिति से उत्पन्न संतानों के वंशज असुर कहलाए । आगे चलकर दोनों समुदाय शक्तिशाली राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गए और लगभग १४००० BCE से उनके बीच अनेक युद्ध हुए । दैत्य[2] असुरों की एक प्रमुख शाखा थे, जिनका वंश दिति से चला । हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु और महाबली इसी वंश के प्रसिद्ध शासक माने जाते हैं ।
देवासुर संग्राम, अर्थात् देवताओं और असुरों के बीच हुए दीर्घकालीन युद्ध, वैवस्वत मनु के काल में अपने चरम पर पहुँचे । लगभग १२०००–११२०० BCE के बीच असुरों ने अनेक युद्धों में बढ़त बनाई और कुछ समय के लिए देवताओं पर प्रभुत्व स्थापित किया । अंततः लगभग ११३०० BCE के आसपास इन्द्र के नेतृत्व में देवताओं ने निर्णायक विजय प्राप्त की और पुनः अपनी सर्वोच्चता स्थापित की ।
वेदों का संकलन
शंकर रुद्र वंश के एक महान राजर्षि थे । उन्होंने योग, नाट्य, संगीत, शिल्प, व्याकरण तथा अनेक ज्ञान-परम्पराओं की आधारशिला रखी । बाद में विभिन्न ऋषियों ने उनके उपदेशों को संरक्षित, विकसित तथा लिपिबद्ध किया ।
लगभग ११२९५ BCE के आसपास विवस्वान मनु ने ऋग्वेद के दशम मण्डल का तेरहवाँ सूक्त रचा । वैवस्वत मनु ने लगभग ११२७५–१११७५ BCE के बीच ऋग्वेद के पाँच सूक्तों की रचना की । प्रसिद्ध पुरुष सूक्त के ऋषि नारायण माने जाते हैं । लगभग १११५० BCE में ऋषि वशिष्ठ मैत्रावरुणि ने ऋग्वेद के सप्तम मण्डल के अनेक सूक्तों की रचना अथवा संपादन किया । लगभग ११२२५ BCE के आसपास प्रजापति परमेष्ठिन् ने प्रसिद्ध नासदीय सूक्त की रचना की ।
इन तथा अन्य अनेक ऋचाओं का संकलन बाद में त्रेता युग में ऋषि शौनक द्वारा वर्तमान ऋग्वेद संहिता के रूप में किया गया । आज उपलब्ध ऋग्वेद में १,०२८ सूक्त, १०,५५२ मंत्र तथा लगभग १,५३,८२६ शब्द हैं ।
संदर्भ
- The Chronology of India, Vedveer Arya. Manu to Mahabharata. https://dokumen.pub/the-chronology-of-india-from-manu-to-mahabharata
- Wikipedia, The Free Encyclopedia. Daitya. https://en.wikipedia.org/wiki/Daitya