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असीरिया

Tiamat

असीरियों और सुमेरियों[1] ने लिखित इतिहास की शुरुआत (लगभग ३१०० BCE) से लेकर बेबीलोन के पतन (५३९ BCE) तक मेसोपोटामिया में एक समृद्ध सभ्यता का विकास किया । इन सभ्यताओं ने गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की । विशेष रूप से आठवीं और सातवीं शताब्दी BCE में बेबीलोन के विद्वानों ने खगोलीय पिंडों की गति का व्यवस्थित अध्ययन किया तथा सृष्टि की उत्पत्ति और ब्रह्माण्ड की संरचना से संबंधित अपने विचारों को धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथों में संकलित किया ।

मेसोपोटामिया की सृष्टि-कथा में तियामत[2] आदिकालीन खारे जल तथा सृष्टि से पूर्व विद्यमान आद्य अराजक अवस्था (Primordial Chaos) का प्रतीक हैं । अप्सू मीठे अथवा भूमिगत जल का प्रतिनिधित्व करते हैं । इन दोनों के पवित्र संयोग से सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है । इसी संयोग से लहमू और लहामू का जन्म हुआ, जिनसे आगे अंशार (आकाश) और किशार (पृथ्वी) की उत्पत्ति बताई गई है । इस प्रकार मेसोपोटामियाई परम्परा सृष्टि को आद्य जल से क्रमिक रूप से विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखती है ।

सुमेरिया

Enuma Elish

सुमेरियन[3] सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञात सभ्यताओं में से एक मानी जाती है । उन्होंने कृषि, व्यापार, गणित, लेखन, प्रशासन तथा युद्धकला सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की, जिसका प्रभाव बाद की मेसोपोटामियाई सभ्यताओं पर भी पड़ा ।

एनुमा एलिश[4] मेसोपोटामिया की प्रसिद्ध सृष्टि-कथा है । लगभग एक हज़ार पंक्तियों वाला यह महाकाव्य सात मिट्टी की तख्तियों पर अंकित है । यद्यपि इसका वर्तमान स्वरूप बाद के बेबीलोन काल से संबंधित है, इसके अनेक विचार और कथाएँ १६०० BCE से भी पूर्व की परम्पराओं में मिलते हैं ।

यह कथा सृष्टि के प्राकट्य से पूर्व की अवस्था से आरम्भ होती है, जब केवल आद्य जलरूप देवता अप्सू और तियामत विद्यमान थे । उनके पवित्र संयोग से क्रमिक रूप से अनेक देवताओं का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने आगे चलकर आकाश, पृथ्वी, नक्षत्रों, चन्द्रमा तथा दिन-रात की व्यवस्था स्थापित की । अंततः देवताओं ने मानव की रचना की, ताकि वह सृष्टि के संचालन में उनकी सहायता कर सके ।

फारस

Marduk Tiamat

ऐतिहासिक रूप से ईरान एक बहुजातीय और बहुसांस्कृतिक क्षेत्र रहा है । यहाँ फारसी[5], अज़ेरी, कुर्द, मज़ांदरानी, लूर तथा अनेक अन्य समुदाय निवास करते रहे हैं । पुरातात्त्विक प्रमाणों से ज्ञात होता है कि लगभग १०००० BCE से ७००० BCE के बीच पश्चिमी ईरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रारम्भिक कृषि समुदाय विकसित होने लगे थे ।

अत्रहासिस महाकाव्य में सृष्टि से संबंधित अनेक कथाएँ मिलती हैं, जिनमें मर्दुक[6] और तियामत का वर्णन प्रमुख है । कथा के अनुसार मर्दुक ने तियामत को पराजित कर उसके शरीर को दो भागों में विभाजित किया । एक भाग से आकाश और दूसरे भाग से पृथ्वी की रचना हुई । यह कथा सृष्टि को आद्य अराजक अवस्था से क्रमबद्ध ब्रह्माण्ड के उद्भव का प्रतीकात्मक वर्णन प्रस्तुत करती है ।

मिस्र

Shabaka Stone

मिस्र[7] विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञात सभ्यताओं में से एक है । नील नदी के तटों पर लगभग ६००० BCE से ४००० BCE के बीच विकसित हुई इस सभ्यता ने लेखन, कृषि, नगर नियोजन, संगठित धर्म तथा केंद्रीकृत शासन व्यवस्था के प्रारम्भिक रूपों का विकास किया । इसी कारण प्राचीन मिस्र को मानव सभ्यता के प्रमुख उद्गम स्थलों में से एक माना जाता है ।

शबाका तख्ती[8], जो प्राचीन मिस्र की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है, लगभग ८०० BCE के अंत में मेम्फिस स्थित पताः मंदिर में स्थापित की गई थी । इसमें वर्णित मेम्फाइट सृष्टि-सिद्धांत के अनुसार पताः समस्त सृष्टि तथा देवताओं के आदि सृजनकर्ता हैं । इस परम्परा के अनुसार सृष्टि का प्रारम्भ पहले पताः के हृदय (विचार) में हुआ और फिर उनकी वाणी (शब्द) द्वारा उसे अभिव्यक्ति मिली । इसके पश्चात अतुम के माध्यम से सृष्टि का भौतिक विस्तार हुआ । इस प्रकार मिस्री परम्परा में सृष्टि को पहले एक आध्यात्मिक और बौद्धिक प्रक्रिया तथा उसके बाद एक भौतिक सृजन के रूप में देखा गया है ।

चीन

Myriad Things

चीन[9] की सभ्यता ह्वांग हो (पीली नदी) की उपजाऊ घाटी में विकसित हुई और विश्व की सबसे प्राचीन ज्ञात सभ्यताओं में से एक मानी जाती है । चीन में लगभग ७००० BCE के जिआहू प्रतीक (पत्थरों पर अंकित सांकेतिक चिह्न) प्राप्त हुए हैं । आधुनिक देश का नाम (चाइना) संस्कृत शब्द चीन से संबंधित माना जाता है, जिसका उल्लेख महाभारत तथा मनुस्मृति में भी मिलता है ।

एक प्राचीन चीनी मान्यता के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति[10] से पूर्व एक जीवनदायी ब्रह्माण्डीय शक्ति समस्त अस्तित्व का आधार थी । सृष्टि के प्रारम्भ में इसी शक्ति से एकता का प्राकट्य हुआ, जिससे पदार्थ, समय और स्थान की व्यवस्था स्थापित हुई । इस एकता से द्वैत (यिन और यांग) उत्पन्न हुआ, द्वैत से त्रिदेव का प्राकट्य हुआ और उनसे आगे असंख्य जीवों तथा समस्त सृष्टि का विकास हुआ । प्रत्येक जीव अपने भीतर यिन और यांग दोनों तत्त्वों को धारण करता है, और इन्हीं के संतुलन से प्रकृति में सामंजस्य और जीवन की निरंतरता बनी रहती है ।


संदर्भ

  1. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Mesopotamia. https://en.wikipedia.org/wiki/Mesopotamia
  2. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Tiamat. https://en.wikipedia.org/wiki/Tiamat
  3. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Sumer. https://en.wikipedia.org/wiki/Sumer#Culture
  4. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Enūma Eliš. https://en.wikipedia.org/wiki/En%C5%ABma_Eli%C5%A1
  5. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Iran. https://en.wikipedia.org/wiki/Iran
  6. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Marduk. https://en.wikipedia.org/wiki/Marduk
  7. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Egypt. https://en.wikipedia.org/wiki/Egypt
  8. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Shabaka Stone. https://en.wikipedia.org/wiki/Shabaka_Stone
  9. Wikipedia, The Free Encyclopedia. China. https://en.wikipedia.org/wiki/China
  10. Wikipedia, The Free Encyclopedia. Chinese creation myths. https://en.wikipedia.org/wiki/Chinese_creation_myths