प्रस्तावना
मध्ययुगीन यूरोपीय दर्शन[1] सामान्यतः रोमन साम्राज्य के ईसाईकरण (लगभग ५०० CE) से लेकर पुनर्जागरण (लगभग १५०० CE) तक के बौद्धिक विकास को संदर्भित करता है । इस काल में ईसाई धर्मशास्त्र और यूनानी दर्शन के समन्वय का प्रयास किया गया । इस अवधि के प्रमुख विषयों में विश्वास और तर्क का संबंध, ईश्वर का अस्तित्व और एकत्व, धर्मशास्त्र, सार्वभौमिकता तथा व्यक्तित्व की समस्याएँ प्रमुख थीं ।
हिब्रू बाइबिल की प्रथम पुस्तक उत्पत्ति (Genesis) का वर्तमान स्वरूप लगभग ६०० BCE में संकलित माना जाता है । इसमें वर्णित सृष्टि-वृत्तांत[2] यहूदी तथा ईसाई परम्पराओं की आधारभूत सृष्टि-कथा है । प्रथम वर्णन के अनुसार ईश्वर (एलोहीम) ने छह दिनों में आकाश, पृथ्वी तथा समस्त सृष्टि की रचना की और सातवें दिन विश्राम किया, जिसे पवित्र घोषित किया गया । दूसरे वर्णन में ईश्वर ने आदम को पृथ्वी की धूल से बनाया, उसे अदन की वाटिका में स्थापित किया तथा उसके साथी के रूप में हव्वा की रचना की ।
मध्ययुगीन यूरोप में व्यापक रूप से यह माना जाता था कि ईश्वर ने संसार की रचना ईसा के जन्म से लगभग ४००० वर्ष पूर्व की थी । इसी परम्परा के आधार पर १६६४ CE में आयरलैंड के आर्चबिशप जेम्स अशर[3] ने बाइबिल की वंशावलियों का विश्लेषण करके यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि पृथ्वी की रचना २३ अक्टूबर ४००४ BCE को प्रातः ९ बजे हुई थी । यह अनुमान कई शताब्दियों तक यूरोप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता रहा ।
सृजन के छह दिन
प्रथम दिवस
ईश्वर ने प्रकाश की रचना की और उसे अन्धकार से अलग किया । उन्होंने प्रकाश को दिन तथा अन्धकार को रात्रि कहा । संध्या और प्रातः के इस क्रम से प्रथम दिवस पूर्ण हुआ ।
द्वितीय दिवस
ईश्वर ने जल के मध्य एक आकाशमण्डल की रचना की, जिसने ऊपर के जल को नीचे के जल से अलग कर दिया । उन्होंने इस आकाशमण्डल को स्वर्ग कहा । संध्या और प्रातः के साथ दूसरा दिवस पूर्ण हुआ ।
तृतीय दिवस
ईश्वर ने आकाश के नीचे के जल को एक स्थान पर एकत्र किया, जिससे सूखी भूमि प्रकट हुई । उन्होंने सूखी भूमि को पृथ्वी और जल के समूह को समुद्र कहा । इसके पश्चात पृथ्वी पर घास, वनस्पतियाँ तथा फल देने वाले वृक्ष उत्पन्न किए ।
चतुर्थ दिवस
ईश्वर ने दिन और रात्रि के विभाजन तथा समय, ऋतुओं और वर्षों के निर्धारण के लिए आकाश में ज्योतियाँ स्थापित कीं । उन्होंने दो प्रमुख ज्योतियाँ बनाईं—दिन पर शासन करने के लिए बड़ी ज्योति और रात्रि पर शासन करने के लिए छोटी ज्योति । साथ ही तारों की भी रचना की ।
पंचम दिवस
ईश्वर ने जल को विविध प्रकार के जीवधारियों से भर दिया तथा आकाश में उड़ने वाले पक्षियों की रचना की । उन्होंने समुद्री जीवों, जलचर प्राणियों और पक्षियों को आशीर्वाद दिया कि वे फलें-फूलें, संख्या में बढ़ें तथा समुद्र और पृथ्वी को भर दें ।
षष्ठ दिवस
ईश्वर ने पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के स्थलीय जीवों, पशुओं तथा रेंगने वाले प्राणियों की रचना की । इसके पश्चात उन्होंने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया और उसे पृथ्वी, समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों तथा अन्य सभी जीवों पर अधिकार प्रदान किया । ईश्वर ने मनुष्यों को आशीर्वाद दिया कि वे फलें-फूलें, पृथ्वी को आबाद करें और समस्त जीव-जगत की देखभाल करें ।
सातवाँ दिवस : दिव्य विश्राम
स्वर्ग, पृथ्वी तथा समस्त सृष्टि की रचना पूर्ण करने के पश्चात ईश्वर ने सातवें दिन विश्राम किया । उन्होंने इस दिन को आशीष देकर पवित्र ठहराया, क्योंकि इसी दिन सृष्टि-निर्माण का कार्य पूर्ण हुआ था । यह दिन विश्राम, पवित्रता और ईश्वर की उपासना का प्रतीक माना गया ।
संदर्भ
- Wikipedia, The Free Encyclopedia. Medieval philosophy. https://en.wikipedia.org/wiki/Medieval_philosophy
- Wikipedia, The Free Encyclopedia. Genesis creation narrative. https://en.wikipedia.org/wiki/Genesis_creation_narrative
- Wikipedia, The Free Encyclopedia. Ussher chronology. https://en.wikipedia.org/wiki/Ussher_chronology