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जीवात्मा

वैदिक दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड परमात्मा से व्याप्त है, किन्तु प्रत्येक जीव में चेतना की अभिव्यक्ति समान नहीं होती । चेतना[1] के विभिन्न स्तरों को कलाएँ कहा गया है । जैसे-जैसे चेतना विकसित होती है, जीव की क्षमताएँ, अनुभव करने की शक्ति तथा आध्यात्मिक संभावनाएँ भी विकसित होती जाती हैं । नीचे दी गई तालिका जीवात्मा की अभिव्यक्ति के विभिन्न स्तरों का संक्षिप्त परिचय देती है ।

कला तत्त्व विवरण
पृथ्वी वैदिक परम्परा के अनुसार पत्थरों में भी चेतना का प्रथम स्तर विद्यमान होता है । इसी कारण उन्हें जीवन का एक प्रारम्भिक रूप माना गया है । कुछ परम्पराओं में पत्थरों के नर एवं मादा स्वरूपों का भी उल्लेख मिलता है ।
जल जल में चेतना की अभिव्यक्ति पृथ्वी की अपेक्षा अधिक विकसित मानी गई है । यह अधिक गतिशील है तथा दो आयामों में स्वतंत्र रूप से प्रवाहित हो सकता है ।
अग्नि अग्नि में चेतना का अगला स्तर प्रकट होता है । यह केवल फैलती ही नहीं, बल्कि ऊपर की ओर गतिशील होने का स्वभाव भी रखती है, जिससे इसकी स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति जल से अधिक मानी जाती है ।
वायु वायु तीनों आयामों में स्वतंत्र रूप से विचरण कर सकती है । इसकी गति, विस्तार और स्वतंत्रता पृथ्वी, जल तथा अग्नि की तुलना में अधिक मानी गई है ।
आकाश आकाश वह आधार है जिसमें शेष सभी तत्त्व विद्यमान हैं । वैदिक दर्शन में इसे केवल रिक्त स्थान नहीं, बल्कि वह आयाम माना गया है जिसमें स्थान और समय दोनों समाहित हैं ।
वनस्पति वनस्पति जीवन का प्रारम्भिक जैविक रूप है । इसमें प्राणशक्ति स्पष्ट रूप से प्रकट होती है । इसकी वृद्धि, अनुकूलन तथा स्मृति मुख्यतः जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं पर आधारित होती है, जिससे यह अपने परिवेश के अनुसार स्वयं को ढालने में सक्षम होती है ।
पशु इस श्रेणी में सभी जलीय, उभयचर, नभचर तथा स्थलीय प्राणी सम्मिलित हैं । इनमें मन का विकास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । ये अनुभवों से सीखते हैं, सुख-दुःख का अनुभव करते हैं तथा अपने परिवेश के अनुसार व्यवहार में परिवर्तन करने की क्षमता रखते हैं ।
मानव मानव वह प्रथम जीव है जिसमें बुद्धि पूर्ण रूप से विकसित होती है । मन के अतिरिक्त उसमें विवेक, तर्क, आत्मचिन्तन तथा दूरगामी परिणामों पर विचार करने की क्षमता होती है । यही गुण उसे आध्यात्मिक साधना और आत्मज्ञान के योग्य बनाते हैं ।
अतिमानव अतिमानव वे व्यक्ति हैं जो अपनी असाधारण क्षमता, प्रतिभा या प्रभाव के कारण सामान्य मानवों से अलग दिखाई देते हैं । उनके कार्य समाज पर अत्यन्त सकारात्मक अथवा नकारात्मक—दोनों प्रकार का प्रभाव डाल सकते हैं ।
१० पितृ अनेक संस्कृतियों में पूर्वजों का सम्मान और स्मरण किया जाता है । वैदिक परम्परा में इन्हें पितृ कहा गया है । माना जाता है कि वे स्थूल शरीर का त्याग करने के पश्चात भी अपने वंशजों के कल्याण की कामना करते हैं तथा अवसर आने पर उनका मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्रदान कर सकते हैं ।
११ किन्नर किन्नर पितृों से एक स्तर ऊपर माने गए हैं । गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार वे प्रायः बड़े सामाजिक कार्यों, सांस्कृतिक आंदोलनों अथवा राजनीतिक नेतृत्व से जुड़े व्यक्तियों के पीछे कार्यरत सूक्ष्म शक्तियों के रूप में वर्णित किए गए हैं ।
१२ गंधर्व गंधर्व कला, संगीत, नृत्य और सौन्दर्य के अधिष्ठाता माने जाते हैं । गुरुदेव के अनुसार असाधारण कलाकारों की प्रतिभा और प्रसिद्धि के पीछे गंधर्वों का प्रभाव हो सकता है । वे व्यक्ति को यश और लोकप्रियता तो प्रदान करते हैं, किन्तु यदि आध्यात्मिक संतुलन न हो तो उसका निजी जीवन अशांत भी हो सकता है । गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने से इस असंतुलन को दूर किया जा सकता है ।
१३ यक्ष यक्ष समृद्धि और धन के अधिष्ठाता माने गए हैं । गुरुदेव के अनुसार जिन व्यक्तियों पर यक्षों की कृपा होती है, उन्हें अपार धन और वैभव प्राप्त हो सकता है । किन्तु केवल धन से जीवन पूर्ण नहीं होता । यदि आध्यात्मिक दृष्टि और जीवन-मूल्य साथ न हों, तो परिवार और विशेषकर अगली पीढ़ियों में दुःख और असंतोष उत्पन्न हो सकता है । साधना और सत्संग इस असंतुलन को दूर करने में सहायक होते हैं ।
१४ देवता देवता सृष्टि के विभिन्न नियमों और शक्तियों के अधिष्ठाता माने गए हैं । शास्त्रों में तैंतीस प्रकार के देवताओं का उल्लेख मिलता है । गुरुदेव के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तथा मानव शरीर की जटिल कार्यप्रणाली इन्हीं दैवी शक्तियों के माध्यम से संचालित होती है । ये परमात्मा नहीं हैं, बल्कि उसी एक परम चेतना की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं । श्री हनुमान देवत्व के ऐसे ही एक महान उदाहरण माने जाते हैं ।
१५–१६ सिद्ध सिद्ध अथवा प्रबुद्ध जीव वह है जिसने आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लिया है और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो गया है । वह केवल स्वयं ही मुक्त नहीं होता, बल्कि अन्य साधकों को भी मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर करने की क्षमता रखता है । उसके लिए 'बनने' की यात्रा समाप्त हो चुकी होती है और वह 'होने' की सर्वोच्च अवस्था में स्थित होता है । श्रीकृष्ण ऐसे ही पूर्ण सिद्ध पुरुषों के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं ।

सारांश

वैदिक परम्परा के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही परम चेतना विभिन्न स्तरों पर अभिव्यक्त होती है । चेतना की इन अभिव्यक्तियों को कलाओं के माध्यम से समझाया गया है । जैसे-जैसे कलाओं का विकास होता है, जीव की क्षमताएँ, अनुभव करने की शक्ति, विवेक तथा आध्यात्मिक संभावनाएँ भी विकसित होती जाती हैं ।

मानव जीवन का विशेष महत्त्व इसलिए माना गया है क्योंकि इसी स्तर पर जीवात्मा में आत्मचिन्तन, विवेक तथा आत्मसाक्षात्कार की क्षमता पूर्ण रूप से विकसित होती है । योग, ध्यान, सेवा और साधना के माध्यम से मनुष्य अपनी चेतना का विस्तार कर परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है ।

संदर्भ

  1. YouTube, Gurudev Sri Sri Ravi Shankar. These Unseen Beings. https://www.youtube.com/watch?v=LrxCPXbH8b0